नर्मदा यात्रा से लौटने के बाद 'गीता को जानें' स्तंभ का प्रकाशन फिर से शुरू हुआ है। इस अंक में यज्ञशिष्ट और उसके आध्यात्मिक महत्व पर चर्चा की गई है।
ओमप्रकाश श्रीवास्तव
गीता को जानें स्तंभ के लेखक नर्मदा यात्रा पर थे, इसलिए इसका प्रकाशन 61 अंक के बाद कुछ समय के लिए स्थगित रहा। आज से यह स्तंभ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।पूर्व श्लोक में भगवान् ने ऐसे व्यक्ति को चोर कहा था, जो स्वयं तो दूसरों से लाभ लेता है, परंतु उन्हें बदले में कुछ नहीं देता। इसी बात को दूसरी तरह से समझाने की दृष्टि से भगवान् यज्ञ करने और न करने का परिणाम बता रहे हैं "यज्ञशिष्ट (यज्ञ से बचा हुआ) खाने वाले संत सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। किंतु जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पापीजन तो पाप ही खाते हैं।" (गीता 3.13)
यज्ञशिष्ट का साधारण अर्थ है यज्ञ के बाद बची हुई सामग्री। हम पूर्व लेखों में देख चुके हैं कि यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देकर हवन करने तक ही सीमित नहीं है। सृष्टि का प्रत्येक घटक अपना आत्मोत्सर्ग करके दूसरों के लिए अनुकूल परिस्थिति उपलब्ध करा रहा है। यज्ञ की यह अवधारणा त्याग और सेवा पर आधारित है। दूसरे का हित करने के लिए उस सीमा तक हमें अपना हित छोड़ना पड़ता है। जगत के सुचारु संचालन के लिए प्रत्येक घटक द्वारा यज्ञ किया जाना आवश्यक है।
यहाँ यज्ञशिष्ट से भाव है दूसरों की सेवा के बाद बचने वाली निर्वाह सामग्री। इसे प्रसाद भी कहते हैं। जो कुछ प्रसाद है, वही पवित्र भोजन है। धर्मशास्त्रों में तो कहा गया है कि भोजन बनाने के बाद उसे सर्वप्रथम भगवान् को अर्पित करें। इसके बाद कुछ भाग चींटी, कुत्ता, गाय आदि को दें (भूत यज्ञ), फिर अतिथि या भूखे मनुष्य को भोजन दें (मनुष्य यज्ञ)। तदुपरांत बालक, वृद्ध, रोगी, गर्भवती स्त्री, घर के सेवक, भृत्य आदि को भोजन कराएँ। इसके बाद जो शेष बचे, उसे गृहस्वामी और गृहस्वामिनी ग्रहण करें।
गांधीजी ने कहा था कि प्रकृति सबकी जरूरतें पूरी कर सकती है, परंतु किसी एक के लालच की पूर्ति नहीं कर सकती। प्रकृति के पदार्थों पर अधिकार सभी का है, उस पर स्वामित्व करने का अधिकार किसी का नहीं है। प्रकृति के पदार्थों पर स्वामित्व का अर्थ है दूसरों को उसके उपयोग से वंचित कर देना। दूसरों की वस्तु पर अधिकार जमाना पाप है। ईशावास्योपनिषद् के प्रसिद्ध मंत्र का अंश है "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा", अर्थात संसार के पदार्थों का त्याग के साथ उपयोग करना चाहिए। अपरिग्रह का सिद्धांत भी यही कहता है कि अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ नहीं रखनी चाहिए। यही संदेश हमें यज्ञभाव से मिलता है।
यहाँ पकाने का अर्थ केवल भोजन पकाने तक सीमित नहीं है, अपितु प्रत्येक भोग-प्राप्ति का प्रयास भी इसमें शामिल है। 'केवल अपने लिए पकाने' का भाव है 'भोग-प्राप्ति केवल अपने लिए करना।' जब हम कोई कार्य केवल अपने लिए करते हैं, जैसे— 'मैं पकाता हूँ ताकि मैं खाऊँ', इससे 'मैंपन' (अहंकार) दृढ़ होता है। अहंकार से कामना जन्म लेती है। कामना ही बंधन का कारण है और सब पापों का मूल है। जब कर्म में कर्तापन (मैं पकाता हूँ) और फल की आसक्ति (मैं खाऊँगा) होती है, तो वह कर्म बंधन बन जाता है। पर जब यही कार्य दूसरों के कल्याण और ईश्वर को अर्पण के भाव से किया जाता है, तो 'मैं' बीच में आता ही नहीं है। वह कर्म यज्ञ हो जाता है और कर्म के बंधन रूप संस्कार चित्त पर नहीं पड़ते। सब पापों से मुक्त होने का आशय भी यही है।
हम देवता, पूर्वज, प्रकृति और समाज से बहुत कुछ लेते हैं। हम इनके सदैव ऋणी हैं। इनकी चिंता किए बिना, इन्हें लौटाए बिना, केवल अपने स्वार्थ के लिए ही कर्म करना, अपने लिए ही सब कुछ चाहना, स्वार्थ, कामना और आसक्ति रखना— भगवान् ऐसे व्यक्ति को 'पाप खाने वाला' कह रहे हैं। ऐसे व्यक्ति सदैव व्यथित और दुःखी रहते हैं। दूसरी ओर, जो दूसरों के हित के लिए कार्य करते हैं, वे संपूर्ण पापों और बंधनों से मुक्त हो जाते हैं तथा सदैव सुखी रहते हैं।
एक ओर यज्ञ सृष्टि के संचालन से जुड़ा है, तो दूसरी ओर परमात्मा की प्राप्ति से। यज्ञ से ही संसार मिलता है और यज्ञ से ही परमात्मा। सृष्टि का यह चक्र परमात्मा से प्रारंभ होता है और महाकल्प के अंत में समस्त सृष्टि अक्षरब्रह्म (परमात्मा) में ही लीन हो जाती है। इस प्रकार यह चक्र परमात्मा से प्रारंभ होकर परमात्मा में ही पूर्ण होता है।'यज्ञशिष्ट' की आध्यात्मिक विवेचना भी की जाती है। इसके अनुसार कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन (अर्थात कर्मयोग) करने के बाद हृदय में समता की प्राप्ति होती है, जिसे भगवान् ने योग (समत्वयोग) कहा है। इस प्रकार कर्मयोग रूपी यज्ञ के बाद जो बचता है, वह है हृदय में समत्वयोग की प्राप्ति। ऐसे समत्वयोग का अनुभव करने वाले व्यक्ति यज्ञशिष्ट को खाने वाले कहे जाते हैं। हृदय में समत्व की स्थापना से अपने आप में पूर्णता की अनुभूति होती है। इसका परिणाम यह होता है कि सांसारिक कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, कर्म बंधन नहीं बनते और पापों से मुक्ति मिल जाती है।
अब भगवान् यज्ञ रूप में विद्यमान सृष्टि चक्र की कार्य-कारण श्रृंखला का वर्णन करते हैं "प्राणिमात्र की उत्पत्ति अन्न से है, अन्न वर्षा से उपजता है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उदय होता है।" (गीता 3.14)
"तू समझ कि कर्म का उद्गम ब्रह्म है। ब्रह्म अक्षर से उत्पन्न है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में स्थित है।" (गीता 3.15)
इस संसार में कोई भी चीज या घटना अचानक नहीं होती। हर कार्य के पीछे कोई कारण होता है और वह कारण स्वयं किसी अन्य कारण का कार्य (परिणाम) होता है। इस प्रकार एक घटना दूसरी घटना का और दूसरी घटना तीसरी घटना का कारण बनती है। इसे दर्शनशास्त्र की भाषा में कार्य-कारण श्रृंखला कहते हैं। जैसे मिट्टी से घड़ा बनता है, तो मिट्टी कारण है और घड़ा उसका कार्य। रस्सी में सर्प की प्रतीति होती है, तो रस्सी कारण है और सर्प उसका कार्य है। भगवान् के बताए सृष्टि चक्र पर विचार करें, तो हम पाते हैं कि यह भी कार्य-कारण की श्रृंखला है।
भूत-प्राणियों का शरीर कार्य है और उसका कारण है अन्न। अन्न कार्य है और उसका कारण है पर्जन्य (मेघ, वर्षा)। पर्जन्य कार्य है और उसका कारण है यज्ञ। यज्ञ कार्य है और उसका कारण है कर्म। कर्म कार्य है और उसका कारण है वेद तथा वेद कार्य है और उसका कारण है अक्षरब्रह्म (परमात्मा)। परमात्मा का कोई कारण नहीं है। सात चरणों की इस प्रक्रिया में यज्ञ बीचों-बीच है। एक ओर यज्ञ से पर्जन्य, पर्जन्य से अन्न और अन्न से प्राणी हैं, तो दूसरी ओर यज्ञ कर्म से, कर्म वेद से और वेद परमात्मा से हैं। एक ओर यज्ञ सृष्टि के संचालन से जुड़ा है, तो दूसरी ओर परमात्मा की प्राप्ति से। यज्ञ से ही संसार मिलता है और यज्ञ से ही परमात्मा। सृष्टि का यह चक्र परमात्मा से प्रारंभ होता है और महाकल्प के अंत में समस्त सृष्टि अक्षरब्रह्म (परमात्मा) में ही लीन हो जाती है। इस प्रकार यह चक्र परमात्मा से प्रारंभ होकर परमात्मा में ही पूर्ण होता है।
जब वर्षा होती है और पृथ्वी की ऊपरी सतह पर जल संगृहीत होता है, तभी अन्न उपजता है। प्राणियों का स्थूल शरीर उनके द्वारा खाए जाने वाले अन्न से बनता है। यह तो स्पष्ट दिखाई देता है और यहाँ तक समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। परंतु इसके आगे इन श्लोकों को समझने में अक्सर विद्वान भी उलझ जाते हैं। इसलिए इनकी अनेक प्रकार से व्याख्याएँ की जाती हैं। हम संक्षेप में इन सब पर विचार करेंगे।