समुद्र-मंथन के अंत में आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि देव और दानवों को हाथों में अमृत कलश लिए मिले थे। उस समय धन्वंतरि चिकित्सा क्षेत्र के बड़े अनुसंधित्सु और वैद्य के रूप में विख्यात हो चुके थे। धन्वंतरि और उनके क्षेत्र के मुखियाओं ने देव व असुरों जैसे पराक्रमियों से संघर्ष के बजाय बेहतर संबंध बनाना उचित समझा। इससे उनके औषधीय अनुसंधानों को व्यापक मान्यता मिलने और चिकित्सा करने का अवसर मिला होगा।
श्रीमद्भागवत और वृहत् ब्रह्मानंद उपनिषद् के अनुसार समुद्र-मंथन से प्रकट होने वाले 14 रत्नों में भगवान धन्वंतरि भी थे। चतुर्भुजधारी धन्वंतरि के एक हाथ में आयुर्वेद शास्त्र, दूसरे में वनस्पति, तीसरे में शंख और चौथे में जीवनदायी अमृत था। सनातन धर्म में उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार माना गया है। उनके हाथ में अमृत-कलश देखकर देव व दानव उसका पान करने के लिए लालायित हो उठे।
धरा पर प्राणियों की सृष्टि से पहले ही प्रकृति ने वनस्पति जगत की सृष्टि कर दी थी, ताकि रोगग्रस्त होने पर मनुष्य उपचार के लिए उनका प्रयोग कर सके।
धन्वंतरि और उनकी पीढ़ियों ने अनेक वनस्पतियों की खोज की और रोगियों पर उनका प्रयोग किया। इन प्रयोगों के निष्कर्षों को श्लोकों में ढालने का उल्लेखनीय काम भी किया, जिससे इस खोजी विरासत का लोप न हो। इन्हीं श्लोकों का संग्रह 'आयुर्वेद' है। एक लाख श्लोकों की इस संहिता को 'ब्रह्म-संहिता' भी कहा जाता है। बाद में इनका वर्गीकरण किया गया। वनस्पतियों के इस कोश और उपचार विधियों का संकलन अथर्ववेद में भी मिलता है। मान्यता है कि धन्वंतरि ने आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति और फिर अश्विनी कुमारों को दिया। अश्विनी कुमारों ने वैद्यों के ज्ञानवर्धन की दृष्टि से 'अश्विनी कुमार संहिता' की रचना की।
एक पुराण-कथा के अनुसार भगवान विष्णु भूलोक में प्राणियों को रोगों से पीड़ित देखकर विशुद्ध नामक मुनि के पुत्र के रूप में अवतरित हुए और चरक नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्हीं चरक ने ऋषि-मुनियों द्वारा रचित संहिताओं को परिमार्जित करके 'चरक संहिता' की रचना की। यह ग्रंथ आयुर्वेद का प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। एक अन्य कथा में उल्लेख है कि इंद्र के अनुरोध पर धन्वंतरि ने काशी के राजा दिवोदास के रूप में जन्म लिया। महर्षि सुश्रुत अपने साथ अन्य ऋषि-पुत्रों को लेकर काशी पहुंचे और उनसे आयुर्वेद की शिक्षा ली।इस समूह ने लोक कल्याण के लिए अपनी-अपनी संहिताओं एवं ग्रंथों की रचना की। इसी ज्ञान-परंपरा में वाग्भट्ट ने 'अष्टांग हृदय संहिता' की रचना की। सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदय संहिता आयुर्वेद के प्रामाणिक ग्रंथों के रूप में आज तक हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।
आयुर्वेद की संहिताओं में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक प्राणी का अस्तित्व पंचतत्वों से निर्मित है। प्राणियों को स्वेदज, जरायुज, अंडज और उद्भिज रूपों में विभाजित किया गया है। इन शास्त्रों में केवल मनुष्य ही नहीं, पशुओं, पक्षियों और वृक्षों के उपचार की विधियाँ भी उल्लेखित हैं। भारत में चिकित्सा विज्ञान का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है। वनस्पतियों के औषधि रूप में उपयोग का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में उपलब्ध है। ऋग्वेद की रचना ईसा से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व हुई मानी जाती है। ऋग्वेद के पश्चात अथर्ववेद में भेषजों की उपयोगिताओं का वर्णन मिलता है। उनके गुणों और उपयोगों का विस्तार से उल्लेख आयुर्वेद में हुआ है। यही आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा विज्ञान की आधारशिला है। इसे उपवेद भी माना गया है। इसके आठ अंगों में आयुर्विज्ञान और चिकित्सा के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया है, इसलिए इसे 'अष्टांग आयुर्वेद' भी कहा जाता है।
ईसा से करीब डेढ़ हजार साल पहले लिखी गई सुश्रुत संहिता में शल्य-विज्ञान का विस्तृत विवरण है। इसी काल में चरक संहिता का प्रादुर्भाव माना जाता है। इसमें चिकित्सा विज्ञान का विस्तृत विवेचन है। चरक ने एकल औषधियों को ही 45 वर्गों में विभाजित किया है। औषधियों की मात्रा और सेवन विधियों का भी तार्किक वर्णन किया गया है। इनका आज की प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों से साम्य भी है। यहाँ तक कि कुछ विधियों में इंजेक्शन द्वारा शरीर में दवा पहुँचाने का उल्लेख मिलता है।
यह वह समय था, जब भारतीय चिकित्सा विज्ञान अपने उत्कर्ष पर था और भारतीय चिकित्सकों की भेषज तथा विष-विज्ञान संबंधी प्रणालियाँ अन्य देशों की तुलना में उन्नत थीं। भूमि के गर्भ में समाए अनेक खनिज पदार्थों के गुणों का ऋषि-परंपरा ने गहन अध्ययन किया और रोगों के उपचार की दिशा में वैज्ञानिक ढंग से अनुसंधान किए। सुश्रुत और चरक की आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी चर्चा होने लगी है। यही कारण है कि एलोपैथी की दवा निर्माता कंपनियाँ अपने कैलेंडरों में सुश्रुत और चरक के शल्य-क्रिया करते हुए चित्र छापने लगी हैं। इस विवेचन से पता चलता है कि धन्वंतरि से जुड़ी आयुर्वेद की ज्ञान-परंपरा वैदिक युग के पूर्व से लेकर भारत में विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले तक विकसित होती रही है।

प्रमोद भार्गव
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)