Sadanira Samagam Bhopal Jal Sanrakshan Charcha

सदानीरा समागम: भारत भवन में जल संरक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन

भोपाल के भारत भवन में आयोजित सदानीरा समागम के तीसरे दिन जलपुराण विषय पर विमर्श हुआ। विशेषज्ञों ने जल संरक्षण, भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण संतुलन पर अपने विचार रखे।<br/>

By : स्वदेश डेस्क
सदानीरा समागम: भारत भवन में जल संरक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन

भोपाल, 29 मई 2026। मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग अंतर्गत वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित सदानीरा समागम के तीसरे दिन भारत भवन में ‘जलपुराण’ विषय पर विशेष विमर्श आयोजित किया गया। कार्यक्रम में पर्यावरण, संस्कृति, समाज और शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने जल संरक्षण, भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विकास की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम की शुरुआत वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने की। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने समाज में जल के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर मंच पर आरोग्य भारती के अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा, पर्यावरणविद् डॉ. विनोद तारे, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा, सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी की कुलाधिपति डॉ. प्रीति सलूजा और भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ल मौजूद रहे।

गिरता भूजल स्तर गंभीर संकेत: डॉ. राजेश शर्मा

आरोग्य भारती के अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा ने कहा कि पृथ्वी पर जीवन का मूल आधार जल है, लेकिन लगातार गिरता भूजल स्तर गंभीर चेतावनी है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते जल संरक्षण को लेकर ठोस प्रयास नहीं किए गए तो आने वाली पीढ़ियों को बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने आधुनिक विकास मॉडल पर चिंता जताते हुए कहा कि विकसित देशों द्वारा प्रदूषणकारी तकनीकों और ई-वेस्ट का बोझ विकासशील देशों पर डाला जा रहा है। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोग होने वाले लिथियम को भी पर्यावरण के लिए नई चुनौती बताया।

भारतीय वाङ्मय में जल को देवतुल्य माना गया: डॉ. विनोद तारे

पर्यावरणविद् डॉ. विनोद तारे ने कहा कि भारतीय पुराणों और वाङ्मय में जल को जीवन और संस्कृति का आधार माना गया है। यदि समाज ने उस दृष्टि को व्यवहार में अपनाया होता तो आज जल संकट जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

उन्होंने कहा कि नदियों का प्रदूषण, भूजल स्तर में गिरावट और जल स्रोतों का समाप्त होना अनियंत्रित विकास का परिणाम है। डॉ. तारे ने वर्षा जल संरक्षण और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।

भारतीय पुराण जल चेतना से परिपूर्ण: डॉ. मुकेश मिश्रा

दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा ने कहा कि भारतीय वाङ्मय का ऐसा कोई ग्रंथ नहीं है जिसमें जल का महत्व वर्णित न हो। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में जल को देवतुल्य स्वरूप दिया गया है और जल संरक्षण की चिंता हजारों वर्ष पहले ही हमारे शास्त्रों में व्यक्त की जा चुकी है।

उन्होंने कहा कि नदियों और जल स्रोतों को भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक चेतना का केंद्र माना गया है। इसलिए जल संरक्षण को केवल सरकारी प्रयासों तक सीमित न रखकर जनभागीदारी से जोड़ना होगा।

जल संकट को लेकर समाज को जागरूक होना होगा: डॉ. प्रीति सलूजा

सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी की कुलाधिपति डॉ. प्रीति सलूजा ने कहा कि जल ही जीवन का आधार है और देश के कई हिस्से आज भी गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने छतरपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां महिलाओं को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि भविष्य में समाज को ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े, इसके लिए अभी से जागरूक और संवेदनशील बनने की आवश्यकता है। साथ ही वीर भारत न्यास और संस्कृति विभाग के प्रयासों की सराहना भी की।

अनियंत्रित शहरीकरण से बढ़ रहा जल संकट: प्रेमशंकर शुक्ल

भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ल ने कहा कि वर्तमान जल संकट का प्रमुख कारण अनियंत्रित शहरीकरण है। आधुनिक जीवन शैली ने प्रकृति और मानव के बीच के संबंधों को कमजोर किया है, जिसके कारण जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। उन्होंने इस अवसर पर अपनी ‘आग’ और ‘पानी’ शीर्षक कविताओं का पाठ भी किया, जिनमें प्रकृति, जीवन और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।

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