मध्यप्रदेश में बाघों की मौत चिंताजनक स्तर पर पहुंची। 2026 के पहले 4 महीनों में 16 बाघों की मौत, निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे।
टाइगर स्टेट मप्र में हर महीने 4 बाघ कम हो रहे हैं। साल के शुरूआती 4 माह में ही यहां 16 बाघों की मौत हो चुकी है। यह देश भर में हुई बाघों की मौत का अकेले 32 प्रतिशत है। साल 2025 में 50 बाघों की कुल मौतों की तुलना में सामने आये नये तथ्य बाघों की सुरक्षा व निगरानी को लेकर व्यवस्थात्मक गंभीर सवाल खड़े करने लगा हैं।
बता दें कि वर्ष 2022 की गणना के अनुसार प्रदेश में 785 बाघ हैं, जो देश की कुल संख्या का 21.38 प्रतिशत हैं। लेकिन वर्ष 2026 की शुरुआत के पहले 4 महीनों में ही 16 बाघों की मौत ने हालात चिंताजनक बना दिए है। क्योंकि 7 जनवरी से 6 अप्रैल के बीच हुई इन मौतों का प्रतिशत बाघ आबादी का लगभग 2.30 प्रतिशत है। तुलना करें तो देशभर में इसी अवधि में 49 बाघों की मौत हुई है, जो कुल संख्या का 32 प्रतिशत है। यानी मध्य प्रदेश में स्थिति ज्यादा गंभीर नजर आ रही है।
देर से मिल रहे शव, निगरानी पर सवाल
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में बाघों के शव एक सप्ताह या उससे अधिक समय बाद मिले हैं। हाल ही में सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में एक बाध का शव 23 दिन बाद मिला। आश्चर्यजनक बात यह है कि टाइगर के पंजे के दो नाखून और निचले जबड़े के दो दांत गायब थे।
ज्यादा मरे वयस्क बाघ
मृत बाधों में शावकों के इतर वयस्क बाधों की संख्या ज्यादा है। चार महीनों में इनकी संख्या 7 से अधिक रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक वयस्क बाध नई टेरेटरी को लेकर कई बार अपनी जान गवां देता है। यहां उप-वयस्क 2 और 2 शावक भी मृत पाये गये हैं।
शिकार और करंट से मौतें बढ़ीं
बाधों की मौतों में आधे से ज्यादा मामले शिकार या मानवजनित कारणों से जुड़े बताए जाते हैं। उमरिया में तीन बाधों की करंट लगने से मौत हुई है। यह मौतें अवसर शिकारियों द्वारा जंगली जानवरों के लिये बिछाये गए अवैध बिजली के तारों की चपेट में आने से होती है।
कब-कब हुई बाघ की मौत
जनवरी 2026:7
फरवरी 2026: 4
मार्च 2026:2
प्रमुख टाइगर रिजर्व जहां घटनाएं हुई
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व
कान्हा टाइगर रिजर्व
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व
रातापानी टाइगर रिजर्व
वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
बाघों की बढ़ती संख्या के लिहाज से क्षेत्र कम पड़ रहे है। अपनी टेरेटरी बनाने और बचाने संघर्ष में बाघ की जान चली जाती है। वन विभाग इस तरह के मामलों में कुछ नहीं कर सकता है। घटते जंगल और स्थानीय प्रशासनिक प्रतिशोध का शिकार भी यह बनते हैं।
डॉ सुदेश बाघमारे, वन्यप्राणी विशेषज्ञ
इनका कहना है
बाधों की मौत से जुड़े प्रत्येक प्रकरण की समीक्षा की जा रही है। वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों को रोकने निगरानी और सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिये गये हैं।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी)