मध्यप्रदेश में OBC आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2 केस रिकॉल किए। 87-13 फार्मूले पर अब खुद सुनवाई करेगा, अप्रैल में होगी अगली सुनवाई।
जबलपुर। मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई में अब एक नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में संशोधन करते हुए दो अहम मामलों को वापस अपने पास ले लिया है। इस फैसले के बाद अब 87-13 फीसदी आरक्षण फार्मूले पर सीधे सुप्रीम कोर्ट ही सुनवाई करेगा। यानी इस मुद्दे की दिशा अब दिल्ली से तय होगी।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी 2026 को एक आदेश दिया था। इसमें ओबीसी आरक्षण से जुड़े कई मामलों को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट भेज दिया गया था। लेकिन अब 20 मार्च को हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने उस आदेश में बदलाव करते हुए 2 मामलों को रिकॉल कर लिया है।
किन मामलों पर खुद सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट?
इनमें प्रमुख रूप से दीपक कुमार पटेल बनाम मध्यप्रदेश शासन और हरिशंकर बरोदिया बनाम मध्यप्रदेश शासन जैसे केस शामिल हैं। इन पर अब सुप्रीम कोर्ट खुद सुनवाई करेगा।
87-13 फार्मूले पर फिर बहस
मामले का सबसे अहम हिस्सा 87-13 का फार्मूला है, जिसे चुनौती दी गई है। इसी फार्मूले के तहत 13% ओबीसी आरक्षण को होल्ड रखने का मुद्दा जुड़ा हुआ है। अब सुप्रीम कोर्ट अप्रैल के दूसरे हफ्ते में इस पर विस्तार से सुनवाई करेगा।
बाकी केस हाईकोर्ट में
सुप्रीम कोर्ट ने बाकी मामलों को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर भेज दिया है। कुल 52 से ज्यादा प्रकरण ट्रांसफर किए गए। 103 याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। 2 से 15 अप्रैल तक नियमित सुनवाई तय की गई है। इससे साफ है कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट बड़े मुद्दे को देखेगा। वहीं, बाकी मामलों का निपटारा हाईकोर्ट स्तर पर होगा।
क्या कहा वकीलों ने?
ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने बताया कि यह संशोधन काफी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, पहले सभी केस ट्रांसफर कर दिए गए थे। लेकिन अब दो प्रमुख मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास रखकर संकेत साफ है। कोर्ट इस विवाद के मूल मुद्दे पर खुद फैसला देना चाहता है।
आगे क्या?
अब नजर अप्रैल के दूसरे हफ्ते पर है, जब सुप्रीम कोर्ट 87-13 फार्मूले पर सुनवाई करेगा। वहीं, हाईकोर्ट में 2 अप्रैल से सुनवाई शुरू हो जाएगी। यानी आने वाले कुछ दिन इस पूरे मामले के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं। फिलहाल इतना तय है कि ओबीसी आरक्षण का मुद्दा अभी और लंबा खिंच सकता है। इसका असर भर्ती और चुनावी समीकरणों तक भी जा सकता है।