मध्य प्रदेश में 83% कुओं में जलस्तर बढ़ा, 49% में 2 मीटर तक सुधार। केंद्र की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, लेकिन 39 जिलों में नाइट्रेट बढ़ना चिंता का कारण।
भोपाल।: मध्य प्रदेश में भूजल स्तर को लेकर राहत भरी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार की ‘डायनामिक ग्राउंड वॉटर असेसमेंट रिपोर्ट 2025’ के अनुसार राज्य के 82.82% निगरानी कुओं में जलस्तर बढ़ा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 73.25% से काफी बेहतर है। रिपोर्ट के अनुसार 1036 कुओं के डेटा में से 858 कुओं में जलस्तर बढ़ा है। इनमें से करीब 49% कुओं में 0 से 2 मीटर तक वृद्धि दर्ज की गई।
- 0–2 मीटर वृद्धि: 506 कुएं (48.8%)
- 2–4 मीटर वृद्धि: 237 कुएं (22.9%)
- 4 मीटर से अधिक वृद्धि: 115 कुएं (11.1%)
वहीं 176 कुओं (करीब 17%) में जलस्तर में गिरावट भी दर्ज की गई है, जो कुछ क्षेत्रों में चुनौती को दर्शाता है।
70% ब्लॉक ‘सुरक्षित’ श्रेणी में
राज्य के 317 ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक (करीब 70%) सुरक्षित श्रेणी में हैं। इसका मतलब है कि इन इलाकों में जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना ही रिचार्ज भी हो रहा है।
- सुरक्षित: 221 ब्लॉक
- अर्ध-गंभीर: 64 ब्लॉक
- गंभीर: 6 ब्लॉक
- अति-दोहित: 26 ब्लॉक
सरकारी योजनाओं का दिखा असर
भूजल स्तर में सुधार के पीछे कई योजनाओं और प्रयासों का योगदान बताया गया है। अटल भूजल योजना से जल गिरावट की रफ्तार कम हुई, माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा मिला है। अमृत सरोवर से 2,901 तालाबों से वर्षा जल संचयन बढ़ा है और जल शक्ति अभियान से 5 लाख से ज्यादा जल संरक्षण कार्य पूरे किए हैं इन प्रयासों से भूजल रिचार्ज में सुधार हुआ और सिंचाई के लिए वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा मिला। मध्य प्रदेश की स्थिति राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से बेहतर बताई गई है, जहां भूजल का अत्यधिक दोहन चिंता का विषय बना हुआ है।
मालवा क्षेत्र में अभी भी दबाव
इंदौर, उज्जैन और शाजापुर जैसे मालवा क्षेत्र के जिले अब भी ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में हैं। यहां भूजल दोहन 80% से अधिक है, जिससे भविष्य में जल संकट की आशंका बनी हुई है। राज्य में भूजल स्तर में सुधार सकारात्मक संकेत है, लेकिन जल गुणवत्ता और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक दोहन की समस्या को लेकर सतर्क रहने की जरूरत बनी हुई है
नाइट्रेट बढ़ना नई चुनौती
जहां एक ओर पानी की उपलब्धता बढ़ रही है, वहीं गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ी है। राज्य के 55 में से 39 जिलों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा अधिक पाई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण खेती में रासायनिक खादों का अधिक उपयोग और शहरी क्षेत्रों में सीवेज प्रबंधन की कमी है।