मध्यप्रदेश में भाजपा नेताओं के बड़े काफिलों पर सवाल। पीएम मोदी और CM डॉ. मोहन यादव की ईंधन बचत अपील के बावजूद दिखावे की राजनीति पर विशेष टिप्पणी।
राजदेव पांडेय
नए बने निगम-मंडल अध्यक्ष हों, मंत्री हों या फिर अधिकारी ऐसा लग रहा है कि उनके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात के कोई मायने ही नहीं हैं। प्रधानमंत्री की ईंधन बचाने की बात को ‘इवेंट’ बनाकर रख दिया गया है। नेताजी ऑटो में और उनके पीछे गाड़ियों का काफिला। प्रधानमंत्री ने ऐसा ड्रामा करने के लिए तो नहीं कहा था। भाजपा के नेताओं को अब अपने बारे में विचार करना चाहिए।
मध्यप्रदेश में इन दिनों भाजपा नेताओं को पद मिल रहे हैं और पद प्राप्ति की मुहिम ने मोदी के संदेश को तकरीबन हवा में ही उड़ा दिया है। ईंधन बचाने की प्रेरणादायी पहल की अनदेखी मध्यप्रदेश सरकार के तमाम मंत्रियों एवं शीर्ष सरकारी अफसरों पर समान रूप से लागू होती है। प्रदेश नेतृत्व की अपील के बाद भी जनप्रतिनिधि और तमाम नव-नियुक्त पदाधिकारी 50 से 200 गाड़ियों के काफिले के साथ निकलकर अपनी राजनीतिक हैसियत का भद्दा प्रदर्शन कर रहे हैं। कम से कम भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का यह रवैया कतई शोभा नहीं देता।
फिलहाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने वाहनों का काफिला छोटा कर दिया है। राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों ने सरकारी गाड़ियां छोड़ दी हैं। बावजूद इसके, शेष मंत्रियों ने इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। उनकी गाड़ियों के काफिले फर्राटे मार रहे हैं।
रही बात राज्य शासन के शीर्ष सरकारी अफसरों की, तो वे भी सरकारी गाड़ियों में घूम रहे हैं। अफसरों के बारे में स्थापित सत्य है कि उनके पास न्यूनतम दो से पांच तक सरकारी गाड़ियां हैं। उनकी कई सरकारी गाड़ियों का उपयोग तो उनके परिजन भी कर रहे हैं। यहां यह बताना उचित होगा कि राज्य के मंत्रियों एवं शीर्ष सरकारी अफसरों को मिली स्टेट गैरेज की गाड़ियों पर प्रतिमाह औसतन करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। दरअसल, हर माह 12 हजार लीटर डीजल और दो हजार लीटर पेट्रोल पर खर्च होता है। अगर मंत्री या अफसर राजधानी से बाहर गए, तो वहां भराए गए ईंधन पर अलग से खर्च होता है।
अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार को ईंधन बचाकर वित्तीय अनुशासन बनाने के लिए खास रणनीति बनानी होगी। अन्यथा, ईंधन बचाने की मुहिम केवल दिखावटी बनकर रह जाएगी।बीते रोज सभी ने सड़कों पर देखा कि फोटो और सेल्फी के लिए मंत्री और पदाधिकारी दोपहिया वाहनों पर बैठे, लेकिन उनके पीछे सैकड़ों गाड़ियों का काफिला चला। इस संदर्भ में भाजपा विधायक प्रीतम लोधी को ही लें, वे 50-200 गाड़ियों के काफिले के साथ गुजरते दिखाई दिए। भाजपा कब तक लोधी को समझाइश देती रहेगी? कुछ इसी तरह का दृश्य मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर के साथ भी देखा गया।
बता दें कि इस संदर्भ में भाजपा नेतृत्व को अपने नेताओं और मंत्रियों को सिर्फ सलाह और समझाइश देना ही काफी नहीं है। अब ठोस कदम उठाने की जरूरत है। नहीं तो ईंधन बचत की अपील हवा में उड़ जाएगी। यह बात नहीं भूलना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने यह अपील अर्थव्यवस्था को आसन्न संकटों से बचाने के लिए की है। इस अपील के राजनीतिक मायने नहीं हैं।
विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र तोमर का करें अनुकरण
वर्तमान परिदृश्य में मप्र विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र तोमर जनप्रतिनिधियों एवं मंत्रियों के लिए आदर्श उदाहरण हो सकते हैं। जब वे केंद्रीय मंत्री थे, तब उनके पास सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के चार्टर्ड विमान तक उपलब्ध थे। लेकिन उन्होंने हमेशा रेल यात्रा को ही प्राथमिकता दी। आज भी वे ग्वालियर हों या भोपाल, बड़ी सहजता से बिना लाव-लश्कर के गुजरते हैं। लोगों से मिलते-जुलते हैं। लिहाजा, कम से कम उनसे भी सीख ली जा सकती है।