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मंदसौर में विराजमान हैं 7वीं शताब्दी के कुबेर देव, मान्यता- उड़कर आया था मंदिर; धनतेरस पर उमड़ते हैं भक्त

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के खिलचीपुरा में स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर अपनी प्राचीनता और अनोखी धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है।

By : मांडवी मिश्रा
मंदसौर में विराजमान हैं 7वीं शताब्दी के कुबेर देव, मान्यता- उड़कर आया था मंदिर; धनतेरस पर उमड़ते हैं भक्त

 

मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां धन के देवता कुबेर भगवान शिव की पंचायत में विराजमान हैं। इस मंदिर की खासियत सिर्फ यहां स्थापित करीब 1300 साल पुरानी कुबेर प्रतिमा ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी एक अनोखी मान्यता भी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर को देवताओं के सेवक यति उड़ाकर यहां लाए थे। मंदिर की बनावट और इसकी नींव को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं प्रचलित हैं। धनतेरस के मौके पर यहां भगवान कुबेर के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

यह मंदिर मंदसौर के खिलचीपुरा क्षेत्र में स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। आमतौर पर भगवान कुबेर को धन और समृद्धि का देवता माना जाता है और उनके अलग मंदिर बहुत कम देखने को मिलते हैं। लेकिन इस मंदिर में कुबेर देव भगवान शिव के साथ एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं। यही वजह है कि यह स्थान धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

शिव की पंचायत में विराजते हैं कुबेर देव

धौलागढ़ महादेव मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और कुबेर देव की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां कुबेर को शिव पंचायत का हिस्सा माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं और उन्हें धन-संपत्ति, वैभव तथा ऐश्वर्य का अधिपति माना जाता है।

मंदिर में विराजमान कुबेर की प्रतिमा अपनी प्राचीनता और बनावट के कारण भी खास है। पुरातात्विक अध्ययन के आधार पर इसे उत्तर गुप्तकाल यानी सातवीं शताब्दी का माना जाता है। करीब तीन फीट ऊंची इस प्रतिमा में कुबेर देव नेवले पर विराजमान दिखाई देते हैं। उनके हाथों में धन की थैली और प्याला भी दर्शाया गया है। प्रतिमा की कलात्मक बनावट प्राचीन भारतीय मूर्तिकला की झलक दिखाती है।

1978 में हुई थी कुबेर प्रतिमा की पहचान

मंदिर में स्थापित इस प्रतिमा को लेकर बताया जाता है कि वर्ष 1978 में इसकी पहचान भगवान कुबेर के रूप में की गई थी। इसके बाद मंदिर की धार्मिक पहचान और भी बढ़ गई। प्रतिमा की प्राचीनता इसे केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है।

मंदिर की इमारत को भी काफी प्राचीन माना जाता है। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, इसका निर्माण और जीर्णोद्धार मराठाकाल में कराया गया था। मंदिर में मौजूद प्राचीन प्रतिमा और स्थापत्य इसकी ऐतिहासिक विरासत को दर्शाते हैं।

क्या यति उड़ाकर लाए थे मंदिर?

इस मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक मान्यता इसके निर्माण को लेकर है। स्थानीय लोककथा के अनुसार, देवताओं के सेवक यति इस मंदिर को उड़ाकर यहां लाए थे। कहा जाता है कि मंदिर की संरचना सामान्य मंदिरों से अलग है और इसकी पारंपरिक नींव दिखाई नहीं देती। इसी वजह से इसके उड़कर आने की कहानी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।

हालांकि, मंदिर को यति द्वारा उड़ाकर लाए जाने की बात धार्मिक मान्यता और लोककथा का हिस्सा है। इसका कोई ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इतिहास के लिहाज से मंदिर के निर्माण और मरम्मत से जुड़ी जानकारियां अलग हैं। फिर भी स्थानीय लोगों की आस्था में इस कथा का विशेष स्थान है।

धनतेरस पर होती है कुबेर देव की विशेष पूजा

धनतेरस के दिन इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। इस अवसर पर भगवान कुबेर की विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और हवन किया जाता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त से ही धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतारें लगती हैं।

मंदिर में आने वाले भक्तों की मान्यता है कि धनतेरस पर कुबेर देव की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और आर्थिक परेशानियों से मुक्ति मिलती है। इसी विश्वास के चलते मंदसौर के अलावा आसपास के क्षेत्रों और दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

गर्भगृह में नहीं लगाया जाता ताला

मंदिर की एक और विशेषता को लेकर स्थानीय स्तर पर मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि यहां गर्भगृह में ताला नहीं लगाया जाता। मंदिर का प्रवेश द्वार भी अपेक्षाकृत छोटा है, जिसके कारण श्रद्धालुओं को सिर झुकाकर भीतर जाना पड़ता है।

मंदसौर का धौलागढ़ महादेव मंदिर इस तरह आस्था, इतिहास और लोकपरंपराओं का अनूठा संगम है। भगवान शिव की पंचायत में विराजमान प्राचीन कुबेर प्रतिमा, मंदिर से जुड़ी यति की कथा और धनतेरस पर होने वाली विशेष पूजा इसे अलग पहचान देती है। यही कारण है कि यह मंदिर मालवा क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।

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