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IAS Calls Scindia ‘Maharaj’ Row Erupts

IAS ने मंच से सिंधिया को कहा ‘महाराज’, जनसुनवाई से उठी नई बहस, प्रोटोकॉल या परंपरा?

मध्य प्रदेश के शिवपुरी में जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को ‘महाराज’ कह दिया। वीडियो वायरल होते ही प्रोटोकॉल और लोकतंत्र पर बहस तेज हो गई।


ias ने मंच से सिंधिया को कहा ‘महाराज’ जनसुनवाई से उठी नई बहस प्रोटोकॉल या परंपरा

Shivpuri News |

शिवपुरी। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक जनसुनवाई कार्यक्रम अब प्रशासनिक बहस का केंद्र बन गया है। यहां केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधीया की मौजूदगी में कलेक्टर अर्पित वर्मा ने मंच से उन्हें ‘महाराज साहब’ कहकर संबोधित कर दिया। उनके इस संबोधन ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। 

दरअसल, घटना लुकवासा की है। जहां जनता से सीधे आवेदन लिए जा रहे थे। इस दौरान हुआ एक साधारण सा संबोधन अचानक सवालों के घेरे में आ गया। सवाल खड़े हो गए हैं कि क्या लोकतंत्र में ऐसे शब्दों की जगह है या यह सिर्फ स्थानीय परंपरा का हिस्सा है?

क्या हुआ जनसुनवाई के दौरान?

लुकवासा में हुई जनसुनवाई में खुद सिंधिया लोगों से आवेदन ले रहे थे। कलेक्टर अर्पित वर्मा उनके पास खड़े होकर आवेदनों को थैले में जमा कर रहे थे। इसी दौरान माइक संभालते हुए कलेक्टर ने कहा कि 'कोई आवेदक रह गया हो तो तुरंत महाराज साहब को आवेदन दे दें।' बस यहीं से मामला गरमा गया।

वायरल वीडियो ने क्यों बढ़ाई गर्मी?

कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। लोगों ने क्लिप शेयर करते हुए सवाल उठाए कि एक आईएएस अधिकारी द्वारा ऐसा संबोधन क्यों? कुछ यूजर्स इसे ‘राजशाही मानसिकता’ बता रहे हैं, तो कुछ इसे क्षेत्रीय सम्मान की परंपरा कहकर बचाव कर रहे हैं। लेकिन बहस अब सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रही।

प्रशासनिक मर्यादा बनाम स्थानीय परंपरा

आईएएस अधिकारी से अपेक्षा होती है कि वह संवैधानिक भाषा और प्रोटोकॉल का पालन करे। ‘मंत्री जी’ या ‘माननीय’ जैसे संबोधन आम तौर पर स्वीकार्य माने जाते हैं। ऐसे में ‘महाराज’ शब्द का इस्तेमाल कई लोगों को असहज कर गया। खासकर तब, जब यह संबोधन प्रशासनिक मंच से आया हो, न कि किसी समर्थक या कार्यकर्ता की ओर से।

राजनीति में क्यों बढ़ा मामला?

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को तुरंत पकड़ लिया। उनका कहना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को उनके पद से संबोधित किया जाना चाहिए, न कि राजशाही प्रतीकों से। स्थानीय राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा है कि क्या यह व्यक्तिगत सम्मान था या सिस्टम में मौजूद किसी अनकहे दबाव का संकेत?

आम जनता पर क्या असर?

इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है क्या प्रशासन पूरी तरह निष्पक्ष दिख रहा है? जनता के लिए कलेक्टर प्रशासन का चेहरा होता है। ऐसे में शब्दों का चयन सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि भरोसे से भी जुड़ा होता है। फिलहाल कलेक्टर अर्पित वर्मा की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे अटकलें और तेज हो गई हैं।

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