मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिला, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। फैसले के बाद प्रशासन अलर्ट पर है।
धार। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्षों पुराने धार भोजशाला विवाद पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को यहां पूजा-अर्चना का अधिकार दिया है। साथ ही परिसर के संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI को सौंपी गई है। इस फैसले ने प्रदेश की राजनीति और सामाजिक माहौल दोनों में हलचल बढ़ा दी है।
मुस्लिम पक्ष लंबे समय से इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है और शुक्रवार को यहां जुमे की नमाज अदा की जाती रही है। ऐसे में फैसले के दिन प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष सतर्कता दिखाई। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से यह भी कहा कि वे मस्जिद के लिए सरकार से अलग जमीन मांग सकते हैं। फैसले के बाद धार और इंदौर में पुलिस बल को हाई अलर्ट पर रखा गया है।
फैसले के बाद धार में 12 लेयर सुरक्षा व्यवस्था
भोजशाला विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए धार जिला प्रशासन सुबह से ही अलर्ट मोड पर रहा। पुलिस कंट्रोल रूम में जिलेभर से करीब 1200 पुलिसकर्मियों को बुलाया गया। एसपी सचिन शर्मा ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए। शहर में 12 लेयर सुरक्षा घेरा बनाया गया है। रिजर्व पुलिस बल और रैपिड एक्शन फोर्स को भी तैयार रखा गया ताकि किसी तरह की तनावपूर्ण स्थिति न बने।
2022 की याचिका से तेज हुई कानूनी लड़ाई
यह मामला 2022 में नई दिशा में पहुंचा। जब रंजना अग्निहोत्री समेत अन्य लोगों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने, हिंदू समाज को पूर्ण पूजा अधिकार देने और परिसर में नमाज पर रोक लगाने की मांग की गई थी। इसके अलावा ट्रस्ट गठन और ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने की मांग भी उठाई गई।
ASI सर्वे और ऐतिहासिक दावों पर टिका फैसला
2024 में ASI ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे किया था। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया। जनवरी 2026 में वसंत पंचमी के मौके पर सुप्रीम कोर्ट ने यहां पूरे दिन पूजा-अर्चना की अनुमति भी दी थी। हिंदू पक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि भोजशाला प्राचीन सरस्वती मंदिर और विद्या केंद्र था। अधिवक्ताओं ने शिलालेख, स्थापत्य अवशेष, ASI रिपोर्ट और परमार राजा भोज से जुड़े दस्तावेजों का हवाला दिया। समरांगण सूत्रधार ग्रंथ का उल्लेख करते हुए कहा गया कि परिसर की संरचना प्राचीन मंदिर वास्तु मानकों से मेल खाती है।
मुस्लिम पक्ष ने सर्वे रिपोर्ट पर उठाए सवाल
मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में कहा कि यह परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। उनके अनुसार धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट के दायरे में आता है। वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने ASI सर्वे रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सर्वे के दौरान उपलब्ध कराए गए वीडियो और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं। मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि अयोध्या मामले की तरह यहां कोई स्थापित मूर्ति मौजूद नहीं है।
वर्षों से बदलती रही पूजा और नमाज की व्यवस्था
भोजशाला को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था कई बार बदली गई। 2003 से यहां मंगलवार और वसंत पंचमी पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी जाती रही है, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समाज नमाज अदा करता रहा है। 2013 और 2016 में वसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़ने पर यहां तनाव की स्थिति बन चुकी है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ कानूनी आदेश नहीं माना जा रहा, बल्कि आने वाले समय में भोजशाला विवाद की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मोड़ भी माना जा रहा है।