चम्बल नदी में अवैध रेत खनन का बड़ा खुलासा। मुरैना बना एपिक सेंटर, 5000 करोड़ के कारोबार पर सत्ता संरक्षण के आरोप। NGT और हाईकोर्ट के आदेश बेअसर।
एनजीटी और हाईकोर्ट की रोक बेअसर, मुरैना बना अवैध खनन का 'एपिक सेंटर', सिस्टम के सामने बेखौफ माफिया
ग्वालियर-चम्बल अंचल की जीवनदायिनी चम्बल नदी आज अवैध रेत खनन के कारण गंभीर संकट से गुजर रही है। अदालती प्रतिबंधों, एनजीटी की सख्त गाइडलाइंस और प्रशासनिक दावों के बावजूद नदी की छाती से खुलेआम रेत निकाली जा रही है। पिछले दिनों कृषि मंत्री ऐंदल सिंह के 'रेत माफिया' को लेकर दिए बयान के बाद यह मुद्दा जोर-शोर से उछला था और हाल ही में रेत माफिया द्वारा वनरक्षक हरकेश गुर्जर की हत्या से अवैध रेत खनन का मामला फिर सुर्खियों में है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अवैध खनन का यह कारोबार लगातार फल-फूल रहा है।
सूत्रों के अनुसार चम्बल, सिंध और इनकी सहायक नदियों से हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपये का अवैध रेत कारोबार होता है। इस संगठित नेटवर्क में स्थानीय दबंगों के साथ-साथ प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षण की भी चर्चा आम है, जिसके चलते कार्रवाई महज कागजी साबित हो रही है।
दिनदहाड़े होती है रेत की बिक्री
अवैध रेत खनन का सबसे बड़ा केंद्र फिलहाल मुरैना जिला बन चुका है। यहां हालात इतने बेलगाम हैं कि पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों के घरों के आसपास ही रेत की खुलेआम मंडियां सज रही हैं। धौलपुर रोड स्थित अंबाह बायपास के सामने रोजाना रेत का बाजार लगता है। उधर, जौरा रोड पर पीजी कॉलेज के पास भी यही नजारा देखने को मिलता है। एसपी बंगले के आसपास तक रेत का अवैध कारोबार होते देखा जा सकता है।बड़ोखर क्षेत्र में दर्जनों ट्रैक्टर-ट्रॉलियां रोजाना रेत बेचने पहुंचती हैं। इन स्थानों पर दिनदहाड़े ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपरों से रेत की बिक्री होती है, लेकिन कार्रवाई के अभाव में माफिया के हौसले और बुलंद हो रहे हैं।
तीन राज्यों में फैला है अवैध नेटवर्क
चम्बल नदी के श्योपुर, सबलगढ़, अंबाह, पोरसा, अटेर से लेकर राजस्थान के धौलपुर-भरतपुर और उत्तर प्रदेश के इटावा तक अवैध खनन का जाल फैला हुआ है। मुरैना से भिंड तक रोजाना 400-500 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां और 100 से अधिक डंपर व ट्रक निकलते हैं। उधर, श्योपुर-मुरैना बेल्ट में 50-60 वाहन प्रतिदिन रेत की खेप लेकर गुजरते हैं।इतने बड़े पैमाने पर खनन के बावजूद तीनों राज्यों का प्रशासन इसे रोकने में नाकाम साबित हो रहा है।
सैटेलाइट से खुलासा, फिर भी कार्रवाई शून्य
पिछले दिनों सैटेलाइट इमेजरी के जरिए मुरैना क्षेत्र में 96 अवैध खनन स्थलों की पहचान की गई थी। वन विभाग की रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई कि इस तरह के खनन से खनिज संपदा तेजी से समाप्त हो रही है। प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने हर तीन महीने में समीक्षा के निर्देश भी दिए थे, लेकिन यह प्रक्रिया ठंडे बस्ते में चली गई।नतीजा यह हुआ कि अवैध खनन के नए-नए अड्डे विकसित हो गए।
चेकपोस्ट-बैरियर बने 'मूकदर्शक'
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अवैध रेत से भरे वाहन उन सभी चेकपोस्ट और बैरियर से गुजरते हैं, जहां उन्हें रोका जाना चाहिए। चम्बल से निकली रेत भानपुरा, सराय छोला, देवी चौकी, आरटीओ बैरियर, सैल्स बैरियर, कृषि उपज मंडी नाका और टोल प्लाजा पार करते हुए ग्वालियर तक पहुंचती है, लेकिन कहीं भी प्रभावी जांच नहीं होती।हाईकोर्ट ने खनन मार्गों को बंद करने और घाटों पर बोटिंग के जरिए निगरानी के निर्देश दिए थे, लेकिन इनका पालन अब तक नहीं हुआ।
सिस्टम पर उठते सवाल
पूरा मामला प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब सैटेलाइट से प्रमाण मिल रहे हैं, अदालतों के स्पष्ट निर्देश हैं और अवैध कारोबार खुलेआम हो रहा है, तब भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?यह सवाल अब सिर्फ पर्यावरण या कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता का भी बन गया है।
नदी ही नहीं, व्यवस्था भी खोखली
चम्बल में हो रहा अवैध रेत खनन सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की लूट नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोरी का भी प्रतीक बन चुका है। यदि समय रहते सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में इसके पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं।