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Family Values Crisis Raises Social Concern

स्वदेश सरोकार : बिखर रहे परिवार और टूट रही रिश्तों की डोर

भोपाल में पारिवारिक रिश्तों के टूटने और बुजुर्गों की उपेक्षा के मामले बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों ने इसे समाज के लिए गंभीर चेतावनी बताया है।


स्वदेश सरोकार  बिखर रहे परिवार और टूट रही रिश्तों की डोर

नैतिक और परंपरागत पारिवारिक मूल्यों में निरंतर आ रही गिरावट समाज के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। समाज में लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जिनमें रिश्तों की डोर टूटती दिख रही है। उदाहरण के लिए मंगलवार को ही देखें, भोपाल में माता-पिता के बीच होने वाले झगड़ों के तनाव में एक बेटी ने आत्महत्या कर ली। वह हताश हो गई थी। वहीं, एक पिता ने बात न मानने पर अपने नाबालिग बेटे पर ही गोली चला दी। दूसरी ओर समाज में ऐसे भी बुजुर्ग हैं, जो अपने बच्चों से निराश होकर अपनी गुजर-बसर के लिए प्रशासनिक चौखट पर गुहार लगा रहे हैं।

अगर पारंपरिक पारिवारिक मूल्य मजबूत नहीं हुए, तो रिश्तों में बिखराव की घटनाओं में निरंतर वृद्धि का सिलसिला सामाजिक आपदा का रूप भी ले सकता है।

दो वक्त की रोटी के लिए सरकारी चौखट पर बुजुर्ग

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि पूरी जिंदगी जी-जान लगाकर बच्चों को पालने वाले ऐसे कई माता-पिता हैं, जिन्हें दो जून की रोटी के लिए अपने ही बेटों के सामने हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। वहां से निराशा मिलने के बाद उन्हें सरकारी चौखट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। भोपाल में ऐसे दर्जनों मामले सामने आए हैं, जिनमें माता-पिता ने अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एसडीएम कोर्ट में गुहार लगाई है।

इस संदर्भ में खास बात यह है कि अधिकतर मामले शहरी क्षेत्रों के हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार राजधानी भोपाल में ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम’ के तहत तमाम माता-पिता अपने बच्चों के दुर्व्यवहार और घर से निकालने की शिकायत भी कर रहे हैं। यहां दर्ज मामलों की संख्या 88 है। देखने में यह छोटी संख्या लग सकती है, लेकिन हाल के वर्षों में इस तरह के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है।

भोपाल जिले की शहरी तहसीलों में ऐसे मामलों की संख्या अधिक है। अधिकारियों के अनुसार अधिकांश शिकायतें संपत्ति विवाद, अलग रहने, आर्थिक उपेक्षा और पारिवारिक कलह से जुड़ी हैं। इस मामले में चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ मामलों में सबसे ज्यादा प्रताड़ना मां को झेलनी पड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब बुजुर्ग खुलकर शिकायत करने लगे हैं, लेकिन इनके आंकड़े शहरी इलाकों की तुलना में कम हैं।

बात साफ है कि पारिवारिक मूल्यों में लगातार गिरावट हो रही है। बुजुर्गों की व्यथा को इन दो उदाहरणों के जरिए सहजता से समझा जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम’ बुजुर्गों को त्वरित राहत देने के उद्देश्य से बनाया गया था।

पिछले दो सालों में तहसीलों में आए माता-पिता भरण-पोषण के मामले

  • एमपी नगर तहसील — 20

  • बैरागढ़ तहसील — 6

  • टीटी नगर तहसील — 7

  • हुजूर तहसील — 5

  • गोविंदपुरा तहसील — 40

मां को बासी खाना दिया, फिर खाना देना भी बंद कर दिया

गोविंदपुरा तहसील में 80 फीट रोड निवासी रामकली ने शिकायत की थी कि उनके पति गोरेलाल, बेटे भगवान और राजेंद्र ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है। पहले उन्हें बासी खाना देते थे, जिससे उनकी तबीयत खराब हो गई। बाद में खाना देना भी बंद कर दिया।रामकली ने बताया कि उनकी चार बेटियां हैं। एक बेटी उनके पास रहती है, जबकि तीन बेटियां ससुराल में हैं। वे समय-समय पर आकर उनकी देखरेख करती हैं। तत्कालीन गोविंदपुरा एसडीएम रवीश कुमार श्रीवास्तव ने महिला की शिकायत पर सभी के बयान लेने के बाद महिला के पक्ष में आदेश दिए। उन्होंने दोनों बेटों को हर महीने की 1 से 5 तारीख के बीच एक-एक हजार रुपए देने के निर्देश दिए। साथ ही पति गोरेलाल कुशवाह को पत्नी का ख्याल रखने के लिए कहा।

बेटे ने बीमार मां के इलाज में भी नहीं की मदद

मोहन रैकवार 63 वर्षीय हैं और शिवनगर कॉलोनी, भानपुर में रहते हैं। उनके दो बेटे हैं। मोहन एक कमरे में रहते हैं, लेकिन बेटा भरण-पोषण नहीं देता। बीमार मां के इलाज में भी मदद नहीं करता।आवेदक पिता मोहन रैकवार का कहना है कि बेटा और उसकी पत्नी उन्हें गालियां देते हैं, मारपीट करते हैं और जान से मारने की धमकी भी देते हैं। सुनवाई के बाद एसडीएम ने बेटे को माता-पिता के प्रति नरम रवैया रखने, घर की जिम्मेदारी संभालने और हर माह पिता के बैंक खाते में 1000 रुपए जमा करने के निर्देश दिए। साथ ही बीमार छोटे भाई के इलाज में भी मदद करने को कहा।

 

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