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Bastar Maoist Leader Paparao Surrenders

बस्तर में नक्सलियों का आखिरी गढ़ टूटा, पापाराव ने AK-47 के साथ किया सरेंडर

बस्तर में बड़े नक्सली पापाराव ने AK-47 के साथ सरेंडर किया। डेडलाइन से पहले 18 नक्सलियों ने हथियार डाले, माओवाद खत्म होने की उम्मीद तेज हुई।


बस्तर में नक्सलियों का आखिरी गढ़ टूटा पापाराव ने ak-47 के साथ किया सरेंडर

CG News |

बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में वो पल आखिर आ ही गया, जिसका इंतजार लंबे समय से था। नक्सल संगठन के बड़े नामों में गिने जाने वाले पापाराव ने आखिरकार हथियार डाल दिए। बताया जा रहा है कि डेडलाइन खत्म होने से ठीक पहले यह सरेंडर हुआ, और इसके साथ ही बस्तर में माओवाद के खात्मे की तस्वीर अब काफी साफ दिखने लगी है।

AK-47 के साथ थाने पहुंचा पापाराव

बीजापुर जिले के कुटरू थाने में जब पापाराव अपने साथियों के साथ पहुंचा, तो उसके पास AK-47 समेत कई हथियार थे। पुलिस के लिए यह एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। पापाराव लंबे समय से सक्रिय था और इलाके की हर गतिविधि से वाकिफ था। थाने से सभी को बस के जरिए जगदलपुर ले जाया गया। जहां आगे की प्रक्रिया पूरी की गई।

कौन है पापाराव?

पापाराव उर्फ मंगू (56), मूल रूप से सुकमा का रहने वाला है। वह नक्सल संगठन के DKSZCM का मेंबर रहा है, और पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का इंचार्ज भी। जंगल, पहाड़ और रास्तों की उसे इतनी जानकारी थी कि कई बार सुरक्षाबलों के ऑपरेशन से बचकर निकल गया। इसीलिए उसे बस्तर का बड़ा और अनुभवी कैडर माना जाता था।

18 नक्सलियों ने एक साथ डाले हथियार

छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने बताया कि कुल 18 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इनमें 10 पुरुष और 8 महिलाएं शामिल हैं। इनके पास से 8 AK-47, एक SLR और एक INSAS राइफल भी बरामद की गई है। नक्सलियों के पास से मिले हथियार  बताते है कि ये ग्रुप कितना सक्रिय था।

अब लगभग खत्म पश्चिम बस्तर कमेटी

इससे पहले देवा नाम के बड़े कमांडर ने भी सरेंडर कर दिया था। अब पापाराव के हथियार डालते ही पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी लगभग खत्म मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि बाकी बचे नक्सली या तो उम्रदराज हैं, या फिर सक्रिय लड़ाई की स्थिति में नहीं हैं।

एक साल में ऐसे बिखरा संगठन

पिछले एक साल में सुरक्षाबलों ने कई बड़े ऑपरेशन चलाए। इसमें माड़वी हिड़मा, बसवराजू और गणेश उइके जैसे बड़े नामों का अंत हुआ। वहीं, भूपति, रूपेश और रामधेर जैसे नक्सलियों ने भी अपने साथियों के साथ सरेंडर किया यानी संगठन धीरे-धीरे अंदर से टूटता गया।

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