ट्रंप के 15 शर्तों वाले सीजफायर प्रस्ताव पर ईरान ने 7 मांगें रखीं। होर्मुज, न्यूक्लियर डील और प्रतिबंधों को लेकर टकराव, शांति की राह अभी भी मुश्किल।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अब एक नई हलचल दिख रही है। जंग को रोकने की बात हो रही है, लेकिन जैसे-जैसे डिटेल सामने आ रही है, साफ हो रहा है कि मामला आसान नहीं है। अमेरिका की तरफ से डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 15 शर्तों वाला प्रस्ताव दिया है। वहीं, जवाब में ईरान ने भी अपनी 7 मांगें रख दी हैं। यानी बातचीत शुरू होने से पहले ही दोनों तरफ से सख्त रुख दिख रहा है।
थोड़ा साफ शब्दों में कहें तो सीजफायर की बात हो रही है, लेकिन भरोसा अब भी दूर है।
अमेरिका का प्रस्ताव: सीजफायर के साथ सख्त शर्तें
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका चाहता है कि पहले एक महीने का सीजफायर लागू हो। इसके साथ ही ईरान को अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों पर बड़ी कटौती करनी होगी।
क्या चाहता है अमेरिका?
जानकारी के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के इस प्रस्ताव में आर्मी इंस्फ्रास्ट्रंक्चर और मिसाइल क्षमता को खत्म करने की बात कही गई है। इसके साथ ही न्यूक्लियर प्रोग्राम सीमित किया जाए, मिसाइल क्षमता पर रोक या कमी,हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को सपोर्ट बंद हो, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दोबारा खोला जाए, परमाणु ईंधन की सुविधा ईरान के बाहर शिफ्ट हो।
इसके बदले में अमेरिका कुछ राहत देने को तैयार दिख रहा है। आंशिक प्रतिबंधों में ढील, UN की निगरानी में सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम, और थोड़ी आर्थिक मदद भी। लेकिन, यहीं से पेंच शुरू होता है। इतनी सारी शर्तें वो भी सख्ती के साथ, ईरान के लिए मानना आसान नहीं लगता।
‘सिर्फ शर्तें नहीं, गारंटी भी चाहिए’
ईरान ने भी सीधे-सीधे जवाब दिया है। उसने 7 मांगों की लिस्ट सामने रख दी है। साथ ही साफ शब्दों में कहा है कि अगर डील होगी तो बराबरी की होगी। इसके लिए उन्होंने अपनी मांगे भी सामने रख दी है।
ईरान की मुख्य मांगें
युद्ध के नुकसान का मुआवजा
खाड़ी देशों से अमेरिकी सैन्य बेस हटें
भविष्य में हमले न करने की गारंटी
सभी प्रतिबंध पूरी तरह खत्म
होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क का अधिकार
इस समुद्री रास्ते पर प्रभावी नियंत्रण
हिजबुल्लाह पर इजरायली हमले रुकें
मतलब साफ है कि ईरान सिर्फ सीजफायर नहीं चाहता है। वह सुरक्षा और आर्थिक नियंत्रण दोनों चाहता है।
बातचीत की कोशिश, लेकिन जमीन पर शक बरकरार
कहा जा रहा है कि ये प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए ईरान तक पहुंचाया गया। इस दौरान शहबाज शरीफ की भूमिका भी सामने आई है। अमेरिका की तरफ से स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर जैसे नाम बातचीत में शामिल हो सकते हैं, लेकिन ईरान ने अभी तक किसी औपचारिक वार्ता की पुष्टि नहीं की है। उल्टा, तेहरान का कहना है कि कोई सीधी बातचीत नहीं हो रही, सिर्फ सीमित संपर्क हैं।
इजरायल की चिंता, और बढ़ती सैन्य हलचल
इस पूरे घटनाक्रम से इजरायल भी थोड़ा असहज दिख रहा है। वहां का रुख अब तक सख्त रहा है युद्ध जारी रखने का। इधर, अमेरिका ने भी क्षेत्र में अपने कदम पीछे नहीं खींचे हैं। करीब 3000 अतिरिक्त सैनिक भेजे जा रहे हैं। इतना ही नहीं पहले से ही लगभग 50 हजार अमेरिकी सैनिक मिडिल ईस्ट में मौजूद हैं।
ईरान ने भी चेतावनी दी है कि अगर दबाव बढ़ा तो वह होर्मुज में नेवल माइंस बिछा सकता है। इसका असर सिर्फ इस इलाके तक नहीं, पूरी दुनिया की तेल सप्लाई पर पड़ेगा।
रास्ता है लेकिन आसान नहीं
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कोई बिल्कुल नया फॉर्मूला नहीं है, बल्कि पहले की कोशिशों का ही बदला हुआ रूप है। 2025 में भी इसी तरह की पहल हुई थी, जो आगे नहीं बढ़ पाई। फिलहाल स्थिति कुछ ऐसी है कि बातचीत की बात हो रही है। सीजफायर के लिए दोनों तरफ से शर्तें भारी हैं। साथ ही भरोसा अभी भी कम है। यानी, सीजफायर संभव है लेकिन जल्दी या आसानी से हो जाएगा ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी।