ईरान-अमेरिका वार्ता से पहले ईरानी डेलिगेशन पाकिस्तान पहुंचा। लेबनान सीजफायर, न्यूक्लियर प्रोग्राम और होर्मुज स्ट्रेट जैसे अहम मुद्दों पर दुनिया की नजर।
इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित अहम वार्ता से पहले कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। ईरान का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार देर रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पहुंच गया। इस बैठक को मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच बेहद निर्णायक माना जा रहा है।ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ के नेतृत्व में पहुंचे इस डेलिगेशन में विदेश मंत्री अब्बास अराघची, सुप्रीम नेशनल डिफेंस काउंसिल के सचिव अली अकबर अहमदियन और सेंट्रल बैंक गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
लेबनान में सीजफायर ईरान की प्रमुख शर्त
ईरान ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका के साथ किसी भी औपचारिक बातचीत से पहले लेबनान में सीजफायर लागू होना जरूरी है। इसके साथ ही उसने अपने फ्रीज किए गए अरबों डॉलर के फंड जारी करने की भी मांग रखी है।ईरान का कहना है कि जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक वार्ता शुरू नहीं की जाएगी। इस रुख को क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
आज इस्लामाबाद पहुंचेंगे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी शनिवार को इस्लामाबाद पहुंचने वाले हैं। वे इस बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। वेंस ने साफ किया है कि बातचीत में दो प्रमुख मुद्दों पर जोर रहेगा ईरान का परमाणु कार्यक्रम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा।
ट्रम्प की चेतावनी-डील नहीं हुई तो हमला संभव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वार्ता से पहले सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने कहा है कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई कर सकता है। ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी युद्धपोतों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जा रहा है।
इन अहम मुद्दों पर होगी बातचीत
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न्यूक्लियर प्रोग्राम: अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे और परमाणु गतिविधियों को सीमित करे।
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: यह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है। अमेरिका इसे पूरी तरह खुला रखना चाहता है, जबकि ईरान नियंत्रण बनाए रखना चाहता है।
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बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम: अमेरिका लंबी दूरी की मिसाइलों पर रोक चाहता है।
वार्ता पर टिकी दुनिया की नजर
इस्लामाबाद में होने वाली यह वार्ता केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे मध्य-पूर्व और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र ने भी दोनों देशों से इस मौके का उपयोग कर शांति बहाल करने की अपील की है।