स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा से वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित है। सैन्य ताकत, भौगोलिक बढ़त और रणनीति के चलते इस जलमार्ग पर ईरान का दबदबा बना हुआ है।
मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार जारी है। इसके बीच दुनिया की सबसे अहम समुद्री लाइफलाइन में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी करीब चार हफ्तों से बाधित है। इसका असर अब साफ तौर पर ग्लोबल तेल और गैस सप्लाई पर दिखने लगा है। पूरी दुनिया में तेल-गैस को लेकर अफरा-तफरी मची हुई है। कई देशों में ऊर्जा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इस समुद्री रास्ते पर सिर्फ ईरान का अधिकार नहीं है। यह जलमार्ग ईरान और ओमान के बीच बंटा हुआ है। दोनों देशों का अपनी-अपनी तटरेखा से 12 समुद्री मील तक नियंत्रण है। लेकिन इसके बावजूद यहां ईरान का प्रभाव कहीं ज्यादा दिखाई देता है।
ईरान का पलड़ा भारी होने की बड़ी वजह
अगर दोनों देशों की सैन्य ताकत की तुलना करें तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है। ईरान वैश्विक सैन्य ताकत के मामले में काफी ऊपर है। वहीं, ओमान काफी पीछे। ईरान के पास करीब 6.5 लाख सक्रिय सैनिक हैं। साथ ही बड़ी संख्या में रिजर्व और अर्धसैनिक बल भी मौजूद हैं। दूसरी तरफ ओमान की सेना का आकार काफी छोटा है।
वायुसेना और नौसेना में भी यही अंतर दिखता है। ईरान के पास ज्यादा लड़ाकू विमान, ज्यादा जहाज और पनडुब्बियां हैं, जबकि ओमान के पास सीमित संसाधन हैं। यही वजह है कि साझा नियंत्रण के बावजूद इस क्षेत्र में ईरान की पकड़ ज्यादा मजबूत मानी जाती है।
‘चोकपॉइंट’ क्यों कहा जाता है?
विशेषज्ञ इस जलमार्ग को 'चोकपॉइंट' कहते हैं। यानी ऐसा रास्ता जहां से होकर बड़ी मात्रा में वैश्विक व्यापार गुजरता है। लेकिन विकल्प लगभग नहीं के बराबर होता है। यह स्ट्रेट अपने सबसे संकरे हिस्से में करीब 24 मील चौड़ा है। जहाजों के लिए तय दो लेन इससे भी ज्यादा संकरी हैं। यानी अगर यहां कोई रुकावट आती है, तो उसका असर सीधे वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ता है।
भौगोलिक स्थिति भी ईरान के पक्ष में
ईरान की लंबी तटरेखा करीब 1000 मील है। यह उसे इस इलाके में रणनीतिक बढ़त देती है। इस पूरे इलाके में पहाड़, घाटियां, द्वीप और शहरी क्षेत्र मौजूद हैं। इससे किसी भी सैन्य गतिविधि का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। साथ ही ईरान के लिए अपने हथियार सिस्टम छिपाना आसान हो जाता है।
यही वजह है कि यहां किसी भी संभावित हमले की चेतावनी का समय बेहद कम हो सकता है। कई बार सिर्फ कुछ सेकंड का होता है।
‘किल जोन’ जैसी स्थिति
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह इलाका किसी ‘किल जोन’ की तरह काम कर सकता है। यहां से गुजरने वाले जहाजों को न सिर्फ मिसाइल बल्कि ड्रोन, माइंस और तेज रफ्तार छोटी नावों से भी खतरा रहता है। ईरान के पास ऐसे कई गैर-पारंपरिक हथियार हैं, जो कम लागत में बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं।
पारंपरिक नहीं, अब गैर-पारंपरिक युद्ध का खतरा
हालांकि अमेरिका जैसे देश ईरान की पारंपरिक नौसैनिक ताकत को काफी हद तक चुनौती दे चुके हैं। लेकिन असली चिंता उसके गैर-पारंपरिक हथियारों को लेकर है। सस्ते लेकिन घातक ड्रोन, समुद्री बारूदी सुरंगें, तेज गति वाली छोटी हमलावर नावें, विस्फोटकों से भरी मानवरहित नौकाएं शामिल हैं। ये सभी मिलकर किसी भी बड़े युद्धपोत या टैंकर के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।
सुरक्षा आसान नहीं, कई देशों की चिंता बढ़ी
हाल के समय में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास कई जहाजों पर हमले की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और बहरीन जैसे देश भी अब इस जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर सक्रिय हो गए हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां जहाजों की सुरक्षा करना आसान नहीं होगा। इसके लिए पारंपरिक काफिले से आगे बढ़कर मल्टी-लेयर सुरक्षा जैसे सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन और एयर पेट्रोलिंग की जरूरत होगी।