खाड़ी में जहाजों की कमी के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल ढुलाई की लागत सामान्य से नौ गुना अधिक हो गई है, जिससे भारत के लिए आर्थिक चुनौतियां बढ़ी हैं।
खाड़ी में जहाजों की भारी किल्लत से बढ़ा किराया
खाड़ी देशों में सैन्य तनाव कुछ कम होने के बावजूद एक नई आर्थिक चुनौती सामने आ गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही दोबारा शुरू तो हो गई है, लेकिन तेल टैंकरों की भारी कमी बनी हुई है। इसी वजह से भारत आने वाले एक बड़े तेल टैंकर का किराया सामान्य दर की तुलना में करीब नौ गुना अधिक तय हुआ है। इसे इस वर्ष का सबसे महंगा समुद्री किराया माना जा रहा है। इससे साफ है कि खाड़ी संकट अब एक नए आर्थिक रूप में सामने आ रहा है।
20 लाख बैरल तेल लाने वाले टैंकर का रिकॉर्ड किराया
शिप ब्रोकर्स के अनुसार, फारस की खाड़ी से भारत तक करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल लाने के लिए बुक किए गए जहाज का किराया सामान्य से लगभग नौ गुना अधिक है। तनाव के दौरान कई जहाज इस क्षेत्र से दूर चले गए थे और उनकी वापसी धीमी होने के कारण टैंकरों की भारी कमी हो गई है। मांग और आपूर्ति के इस असंतुलन के कारण खरीदारों को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।
युद्धविराम के बाद भी सामान्य नहीं हुए हालात
खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होने और युद्धविराम की खबरों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिर तेज हुई है, लेकिन जहाजों की उपलब्धता अब भी बड़ी समस्या बनी हुई है। दक्षिण कोरिया की शिपिंग कंपनी सिनोकोर द्वारा की गई हालिया बुकिंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री परिवहन क्षेत्र में सामान्य स्थिति लौटने में अभी समय लगेगा।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा की नई चुनौती
भारत सरकार ऊर्जा आपूर्ति और नाविकों की सुरक्षा को लेकर हाई अलर्ट पर है तथा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है। कई भारतीय जहाज इस संवेदनशील समुद्री मार्ग को सफलतापूर्वक पार कर चुके हैं, लेकिन बढ़ती ढुलाई लागत चिंता का विषय बनी हुई है।
कच्चे तेल के दाम घटे, लेकिन राहत नहीं
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटकर करीब 73 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई हैं, लेकिन जहाजों की कमी के कारण बढ़ी ढुलाई लागत भारत की तेल कंपनियों को राहत नहीं दे पा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक टैंकरों की उपलब्धता सामान्य नहीं होती, तब तक तेल आयात की लागत ऊंची बनी रहेगी और इसका असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ता रहेगा।