चीन में नया ‘एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ’ लागू हो गया है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि इससे तिब्बती, उइगर और अन्य अल्पसंख्यकों पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण और बढ़ सकता है।
अनुराग तागड़े
चीन में बुधवार से लागू हुए नए ‘एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ’को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों और कई लोकतांत्रिक देशों का मानना है कि यह कानून चीन की 56 मान्यता प्राप्त जातीय समुदायों के बीच एकता स्थापित करने के नाम पर वास्तव में तिब्बती, उइगर, मंगोल और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की भाषा, संस्कृति, धार्मिक पहचान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। वहीं बीजिंग का दावा है कि यह कानून राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और अलगाववाद पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है।
विदेशों में रहने वालों पर भी होगा असर
इस कानून का सबसे विवादास्पद प्रावधान यह है कि चीन ने दावा किया है कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन चीन की "जातीय एकता" को नुकसान पहुंचाने या अलगाववाद को बढ़ावा देने का प्रयास विदेश में भी करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। चीन के इस सीमापार अधिकार क्षेत्र के दावे ने ताइवान, यूरोप, अमेरिका और भारत सहित कई देशों में चिंता बढ़ा दी है। भारत विशेष रूप से इसलिए संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि यहां चीन के बाहर सबसे बड़ा तिब्बती समुदाय निवास करता है।
शिक्षा से भाषा तक बढ़ेगा सरकारी नियंत्रण
कानून के तहत विद्यालयों में मंदारिन (पुतोंगहुआ) को शिक्षा और सरकारी संवाद की प्रमुख भाषा बनाया गया है। स्कूलों, परिवारों, मीडिया, इंटरनेट मंचों तथा सामाजिक संस्थाओं को "एकीकृत चीनी राष्ट्रीय पहचान" को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी दी गई है। आलोचकों का कहना है कि इससे तिब्बती, उइगर और अन्य स्थानीय भाषाओं तथा सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
मानवाधिकार संगठनों ने जताई गहरी चिंता
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि यह कानून विविधता की रक्षा करने के बजाय अल्पसंख्यकों को हान बहुसंख्यक संस्कृति में समाहित ) करने का कानूनी आधार तैयार करता है। संगठन के अनुसार, कानून में "जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने" जैसी परिभाषाएं अत्यंत व्यापक और अस्पष्ट हैं, जिनका उपयोग शांतिपूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियों या मानवाधिकारों की पैरवी करने वालों के खिलाफ भी किया जा सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से असहमति पर नजर
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून ऐसे समय लागू हुआ है जब चीन कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी तंत्र को तेजी से मजबूत कर रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, अत्याधुनिक एआई प्रणालियों का उपयोग केवल मौजूदा आलोचकों की पहचान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों की भी भविष्यवाणी करने की दिशा में किया जा रहा है जो भविष्य में सरकार के आलोचक बन सकते हैं। इससे डिजिटल निगरानी और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर वैश्विक चिंताएं और बढ़ गई हैं।
चीन का पक्ष
चीन सरकार का कहना है कि यह कानून किसी भी जातीय समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी समुदायों के समान विकास, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक स्थिरता को मजबूत करने के उद्देश्य से बनाया गया है। बीजिंग का दावा है कि पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का प्रयास हैं।
वैश्विक असर
यह कानून केवल चीन की घरेलू नीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीमापार कानूनी दावों, डिजिटल निगरानी और प्रवासी समुदायों पर बढ़ते दबाव के कारण अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी नया विवाद खड़ा कर सकता है। भारत, ताइवान, यूरोप और उत्तर अमेरिका में रहने वाले तिब्बती, उइगर और अन्य चीनी अल्पसंख्यक समुदायों पर इसके प्रभाव को लेकर आने वाले समय में वैश्विक बहस और तेज होने की संभावना है।