ईरान से आ रहे सस्ते तेल को लेकर सवाल है कि खरीदार कौन होगा। खार्ग आइलैंड से आई खेप वाडिनार पहुंचेगी, लेकिन भुगतान और रिफाइनरी चुनौती बनी है।
नई दिल्ली। ईरान से भारत आ रहे सस्ते कच्चे तेल की खेप ने ऊर्जा बाजार में हलचल बढ़ा दी है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है कि इस तेल को आखिर खरीदेगा कौन। गुजरात के वाडिनार पोर्ट पर पहुंचने वाली इस खेप को लेकर तेल कंपनियों और बाजार विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं। भू-राजनीतिक तनाव और भुगतान की चुनौतियों के बीच यह मामला सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक भी बन गया है।
खार्ग आइलैंड की अहम भूमिका
ईरान का खार्ग आइलैंड उसके तेल निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। बताया जाता है कि देश के कुल तेल निर्यात का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा यहीं से होता है। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय तनाव के चलते यह इलाका संवेदनशील बना हुआ है।
अमेरिकी चेतावनी से बढ़ी चिंता
हाल ही में अमेरिका की ओर से साफ संकेत दिया गया है। उनके अनुसार, अगर समझौता नहीं होता तो इस अहम तेल टर्मिनल को निशाना बनाया जा सकता है। इस बयान के बाद क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका और बढ़ गई है। तेल सप्लाई से जुड़े देशों की नजर अब इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है।
वाडिनार में खरीदार को लेकर सवाल
वाडिनार में रूस समर्थित नायरा एनर्जी की बड़ी रिफाइनरी मौजूद है। हालांकि इसके मेंटेनेंस में जाने की संभावना जताई जा रही है, जिससे इस खेप की खरीद को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में माना जा रहा है कि इंडियन ऑयल या भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियां आगे आ सकती हैं।
पहले भी बड़ा ग्राहक रहा है भारत
साल 2019 तक भारत, ईरान के कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार रहा है। एक समय भारत के कुल तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी करीब 11.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। ईरानी तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए तकनीकी रूप से अनुकूल माना जाता रहा है।
प्रतिबंधों के बाद बदला आयात पैटर्न
2018 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत को ईरान से तेल आयात रोकना पड़ा था। इसके बाद भारत ने सऊदी अरब, इराक, अमेरिका और रूस जैसे देशों से खरीद बढ़ाई। अब फिर से ईरान से सप्लाई की संभावना बनने लगी है। हाल के समय में भारत ने वेनेजुएला से भी तेल आयात फिर शुरू किया है। रूस से कच्चे तेल की खरीद भी उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। ऐसे में भारत अलग-अलग स्रोतों से सस्ता तेल जुटाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
भुगतान प्रणाली बनी बड़ी चुनौती
ईरान के साथ व्यापार में सबसे बड़ी अड़चन भुगतान का तरीका बना हुआ है। ईरान अभी भी स्विफ्ट सिस्टम से बाहर है, जिससे अंतरराष्ट्रीय लेन-देन जटिल हो जाता है। पहले तीसरे देश के जरिए भुगतान का रास्ता अपनाया जाता था। लेकिन अब वह भी सीमित हो गया है।
4 अप्रैल की खेप पर टिकी नजर
वाडिनार पोर्ट पर 4 अप्रैल को पहुंचने वाली यह खेप कई मायनों में अहम मानी जा रही है। इसे केवल एक तेल सप्लाई नहीं, बल्कि भारत-ईरान ऊर्जा संबंधों में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। आने वाले समय में हालात के आधार पर आगे की रणनीति तय होगी।