पश्चिम बंगाल में अगले शैक्षणिक सत्र से श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और योगदान को स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला किया गया है।
पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि अगले शैक्षणिक सत्र से राज्य के स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, विचार और राष्ट्र निर्माण में योगदान को शामिल किया जाएगा। इस फैसले को नई पीढ़ी को उनके योगदान से जोड़ने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने कोलकाता स्थित मित्रा इंस्टीट्यूशन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान यह घोषणा की, जहां उन्होंने स्वयं शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों में ‘नेशन फर्स्ट’ की भावना विकसित करना ही डॉ. मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सरकार का मानना है कि उनके विचार और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को शिक्षा प्रणाली में शामिल करने से युवाओं को ऐतिहासिक और वैचारिक समझ मिलेगी।
स्कूल से यूनिवर्सिटी तक होगा पाठ्यक्रम में बदलाव
नई योजना के तहत अब पश्चिम बंगाल के शैक्षणिक संस्थानों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक जीवन, संसद में दिए गए योगदान, केंद्रीय मंत्री के रूप में उनकी भूमिका और कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर उनके कार्यों को पढ़ाया जाएगा। राज्य सरकार का उद्देश्य छात्रों को देश के प्रमुख नेताओं के विचारों और इतिहास से जोड़ना बताया गया है।
शिक्षा और राष्ट्र निर्माण पर फोकस
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. मुखर्जी ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार माना था। उनके अनुसार, शिक्षा केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि इसमें राष्ट्रीय दायित्व और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होनी चाहिए। इसी सोच के साथ पाठ्यक्रम में यह बदलाव किया जा रहा है।
भाजपा मुख्यालय में भी हुई श्रद्धांजलि सभा
इसी अवसर पर कोलकाता स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय में भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया और उनके राष्ट्रवादी विचारों को आगे बढ़ाने की बात कही।
ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व पर जोर
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री और जनसंघ के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। उनके योगदान को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और शैक्षणिक स्तर पर चर्चा होती रही है। अब पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा उनके जीवन को पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला राज्य की शिक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।