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War impact may raise prices of daily essentials

जंग का असर आम आदमी की जेब पर: रोजमर्रा की चीजें महंगी, उद्योग संकट में

पश्चिम एशिया तनाव का असर भारत में दिखने लगा है। कच्चे माल और LPG संकट से रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं, उद्योग और रोजगार पर भी खतरा बढ़ा है।


जंग का असर आम आदमी की जेब पर रोजमर्रा की चीजें महंगी उद्योग संकट में

Middle East Tension |

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है। अब इसका असर दूसरे देशों में भी दिखाई देने लगा है। तनाव की आंच आम लोगों की रसोई और रोजमर्रा के खर्च तक पहुंचने लगी है। कच्चे तेल और अन्य कच्चे माल की कीमतों में तेजी ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ सकता है।

क्यों बढ़ सकते हैं रोजमर्रा के सामान के दाम

कंपनियां बढ़ती लागत के दबाव में अब अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। इसका असर बोतलबंद पानी, नमक, खाद्य तेल जैसी जरूरी चीजों से लेकर एसी, फ्रिज और मेडिकल उपयोग के सामान तक दिख सकता है। दरअसल, कच्चे माल के महंगे होने से उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है। जिसे कंपनियां लंबे समय तक अपने ऊपर नहीं ले पा रही हैं।

प्लास्टिक उद्योग पर सबसे ज्यादा मार

इस संकट का सबसे बड़ा असर प्लास्टिक इंडस्ट्री पर पड़ा है। पिछले एक महीने में प्लास्टिक के कच्चे माल की कीमतें 50 से 70% तक बढ़ चुकी हैं। सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला एलडीपीई प्लास्टिक 110 रुपए प्रति किलो से बढ़कर करीब 180 रुपए तक पहुंच गया है। अन्य पॉलीमर भी 30 हजार से 70 हजार रुपए प्रति टन तक महंगे हो चुके हैं। ऐसे में आने वाले समय में प्लास्टिक से बने उत्पाद 50-60% तक महंगे हो सकते हैं। वहीं पानी की टंकियां और कंटेनर 30-40% तक महंगे होने की आशंका है।

रोजगार पर भी मंडरा रहा खतरा

प्लास्टिक उद्योग से करीब 5 लाख लोग जुड़े हैं। अगर हालात नहीं सुधरे, तो इनमें से 2-3 लाख लोगों की नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकार को राहत देते हुए जीएसटी कम करना चाहिए और बैंकों की वर्किंग कैपिटल लिमिट बढ़ानी चाहिए, ताकि कारोबार संभल सके।

एलपीजी संकट से हजारों फैक्ट्रियां बंद

कॉमर्शियल एलपीजी की भारी कमी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। देशभर में करीब 50 हजार प्लास्टिक फैक्ट्रियां प्रभावित हुई हैं। इसके चलते लगभग 20 हजार यूनिट्स बंद होने की कगार पर हैं या बंद हो चुकी हैं। गुजरात, मध्यप्रदेश और हैदराबाद जैसे औद्योगिक इलाकों में कई प्लांट्स ने उत्पादन घटा दिया है या पूरी तरह रोक दिया है। कच्चे माल और गैस की कमी के चलते पुराने ऑर्डर भी रद्द किए जा रहे हैं।

शहरों में बदली खाने की आदतें

एलपीजी की कमी और घरेलू कामगारों के लौटने से शहरी परिवारों की किचन आदतें बदल रही हैं। अब लोग तेजी से रेडी-टू-ईट फूड की ओर बढ़ रहे हैं। क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर इसकी मांग बढ़ी है। इंस्टेंट नूडल्स, जूस, नट्स और प्रोटीन स्नैक्स की बिक्री में तेज उछाल देखा जा रहा है। इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री भी अचानक कई गुना बढ़ गई है, क्योंकि लोग गैस के विकल्प तलाश रहे हैं।

सीमेंट इंडस्ट्री पर भी असर

इस संकट का असर सीमेंट उद्योग पर भी पड़ा है। पेटकोक, कोयला और पैकेजिंग की लागत बढ़ने से उत्पादन महंगा हो गया है। कंपनियों ने कीमतें बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन बाजार में ज्यादा सप्लाई होने के कारण यह बढ़ोतरी टिक नहीं पाई। हालांकि कुछ क्षेत्रों में हल्की बढ़ोतरी अभी भी बनी हुई है।

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