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SC Cancels Bail Dowry Case

''हाई कोर्ट के साथ दिक्कत क्या है?'' दहेज मौत केस में सुप्रीम कोर्ट का फटकार

उत्तर प्रदेश के एक दहेज मौत केस में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को फटकार लगाते हुए आरोपी की बेल रद्द की। कोर्ट ने सख्त सवाल उठाए, जानिए पूरा मामला और कानूनी असर।


हाई कोर्ट के साथ दिक्कत क्या है दहेज मौत केस में सुप्रीम कोर्ट का फटकार

Supreme court News |

शादी के कुछ सालों के भीतर हुई एक महिला की संदिग्ध मौत अब बड़ा कानूनी सवाल बन गई है। मामला हाई कोर्ट के बाद अब सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और वहां से कड़ा संदेश गया।  गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। सवाल साफ था कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी पति को जमानत कैसे मिल गई?

पीड़िता के पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने न सिर्फ बेल रद्द की, बल्कि आरोपी को एक हफ्ते में सरेंडर करने का आदेश भी दे दिया।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सुनवाई के दौरान साफ कर दिया कि दहेज हत्या जैसे मामलों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। बेंच में शामिल जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई ने पूछा कि जब पोस्टमॉर्टम में चोट के निशान हैं तो जमानत का आधार क्या था। कोर्ट ने आरोपी की दलीलों को कमजोर बताते हुए सीधे कहा कि मुद्दे पर बात करें, वरना यहीं बेल खत्म कर देंगे।

हाई कोर्ट के साथ दिक्कत क्या है?

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने खुलकर नाराजगी जताई। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां जमानत नहीं दी जानी चाहिए, वहां बेल देना समझ से बाहर है। यह टिप्पणी सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं मानी जा रही। इससे निचली अदालतों के फैसलों की जांच और सख्ती बढ़ने के संकेत मिलते हैं।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने बदला केस का रुख

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर खास जोर दिया। रिपोर्ट में गर्दन पर चोट और गला दबाने के संकेत मिले थे। जब राज्य के वकील ने आरोपी के लंबे समय तक जेल में रहने का तर्क दिया, तो कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। जजों ने साफ कहा कि यह हत्या का मामला है। सिर्फ कस्टडी की अवधि से जमानत का फैसला तय नहीं हो सकता।

आम लोगों और कानूनी सिस्टम पर असर

इस फैसले का असर सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहेगा। दहेज हत्या जैसे मामलों में जांच और जमानत प्रक्रिया पर अब ज्यादा निगरानी हो सकती है। महिला सुरक्षा कानूनों को लेकर भी यह एक मजबूत संदेश है कि अदालतें अब ऐसे मामलों में ढील देने के मूड में नहीं हैं। साथ ही, हाई कोर्ट और निचली अदालतों के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की नजर और सख्त होती दिख रही है।

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