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School Violence Warning & MD Drug Menace in India

दुनिया में विद्यालयों में बढ़ती हिंसा और भारत में एमडी नशे का फैलता जाल बड़ी चुनौती

दुनिया में स्कूल हिंसा की बढ़ती घटनाएं और भारत में एमडी नशे का फैलता जाल, युवाओं के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी देती विशेष रिपोर्ट


दुनिया में विद्यालयों में बढ़ती हिंसा और भारत में एमडी नशे का फैलता जाल बड़ी चुनौती

अनुराग तागड़े 

विश्व के विभिन्न देशों में विद्यालय परिसरों में हाल के वर्षों में हुई गोलीबारी और अन्य हिंसक घटनाओं ने वैश्विक समुदाय को गहरी चिंता में डाल दिया है। कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के टम्बलर रिज क्षेत्र में विद्यालय में हुई गोलीबारी तथा दक्षिणी थाईलैंड के सोंगख्ला प्रांत के हाट याई जिले में एक शिक्षिका की हत्या जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा संस्थान भी अब हिंसा से अछूते नहीं रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक तनाव, पारिवारिक विघटन, सामाजिक अलगाव और नशीले पदार्थों की बढ़ती उपलब्धता हिंसक प्रवृत्तियों को जन्म दे रही है। भारत में विद्यालयों में गोलीबारी जैसी घटनाएं भले ही अत्यंत विरल हों, लेकिन नशीले पदार्थों की बढ़ती तस्करी और खपत एक गंभीर सामाजिक चुनौती के रूप में सामने आ रही है।

वर्ष 2020 में 202500 109000 किलो से अधिक मादक पदार्थ जब्त किए गए

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच देशभर में 1,09,000 किलो से अधिक मादक पदार्थ जब्त किए गए। इस दौरान सिंथेटिक ड्रग्स की जब्ती में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2019 में जहां लगभग 1,890 किलो सिंथेटिक ड्रग्स जब्त किए गए थे, वहीं वर्ष 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 11,994 किलो तक पहुंच गया। यह वृद्धि लगभग छह गुना मानी जा रही है, जो बढ़ती मांग और संगठित तस्करी नेटवर्क की ओर संकेत करती है।

इस आयु से शुरू हो जाता है नशे का सेवन

विशेषज्ञ बताते हैं कि एमडी और एमडीएमए जैसे कृत्रिम नशीले पदार्थ अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहे हैं। छोटे शहरों, कॉलेज परिसरों और यहां तक कि विद्यालय आयु वर्ग के किशोरों तक इनकी पहुंच बढ़ रही है। एक अध्ययन के अनुसार, विद्यालय जाने वाले बच्चों में नशे का पहला अनुभव औसतन 12.9 वर्ष की आयु में सामने आता है। लगभग 15.1 प्रतिशत छात्रों ने जीवन में कभी न कभी नशे का सेवन स्वीकार किया है, जबकि 10.3 प्रतिशत छात्रों ने पिछले एक वर्ष में मनोप्रभावी पदार्थों का उपयोग करने की बात कही।

निर्णय क्षमता को कमजोर करता है नशा

मनोचिकित्सकों का कहना है कि किशोरावस्था में नशीले पदार्थों का सेवन मस्तिष्क के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इससे निर्णय क्षमता कमजोर होती है, आवेग नियंत्रण घटता है और आक्रामक व्यवहार की संभावना बढ़ जाती है। यदि इस स्थिति को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो भविष्य में इसके गंभीर सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं।देश के विभिन्न राज्यों में हालिया अभियानों के दौरान हजारों आरोपियों की गिरफ्तारी और बड़ी मात्रा में एमडी सहित अन्य सिंथेटिक ड्रग्स की बरामदगी इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती है।

NO DRUGS : विशेषज्ञों और नीति विश्लेषकों के सुझाव

कनाडा और थाईलैंड की घटनाएं इस बात की चेतावनी हैं कि जब मानसिक असंतुलन, सामाजिक तनाव और नशे का दुष्प्रभाव एक साथ मिलते हैं, तो परिणाम अत्यंत घातक हो सकते हैं। भारत के लिए यह समय सजगता और समन्वित कार्रवाई का है।

इस चुनौती से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता पर जोर दिया है

  1. विद्यालयों और महाविद्यालयों में अनिवार्य नशा जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाएं, जिनमें केवल औपचारिक व्याख्यान नहीं, बल्कि परामर्श, संवाद और व्यवहारिक मार्गदर्शन शामिल हो।
     

  2. प्रत्येक जिला स्तर पर किशोर मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की जाए, जहां गोपनीय परामर्श और पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध हो।
     

  3. सीमावर्ती क्षेत्रों और तटीय मार्गों पर निगरानी तंत्र को और सुदृढ़ किया जाए तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर तस्करी नेटवर्क को तोड़ा जाए।
     

  4. अभिभावकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएं, ताकि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले परिवर्तनों को समय रहते पहचान सकें।
     

  5. पुनर्वास केंद्रों की संख्या और गुणवत्ता में सुधार किया जाए, जिससे नशे के शिकार युवाओं को समाज में पुनः स्थापित किया जा सके।
     

  6. विद्यालय परिसरों के आसपास संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी और सामुदायिक पुलिसिंग को बढ़ावा दिया जाए।
     

  7. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नशीले पदार्थों के अवैध प्रचार और बिक्री के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
     

सजगता और समन्वित कार्रवाई का समय

विद्यालयों की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न भी है। यदि शासन, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर ठोस और निरंतर प्रयास करें, तो नशे के इस फैलते जाल को रोका जा सकता है और भावी पीढ़ी को सुरक्षित दिशा दी जा सकती है।



 

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