भारत पर जब-जब आर्थिक संकट आया, सोने ने बड़ी भूमिका निभाई। 1962 युद्ध से 1991 संकट और अब पीएम मोदी की गोल्ड अपील तक जानिए पूरी कहानी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘एक साल तक सोना न खरीदें’ वाली अपील ने देश में नई बहस छेड़ दी है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और महंगे होते कच्चे तेल के बीच सरकार चाहती है कि विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। यही वजह है कि लोगों से गोल्ड खरीद कम करने की अपील की गई है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड आयातकों में शामिल है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब देश आर्थिक संकट में फंसा, तब-तब सोने ने ही भारत को संभाला। कभी सरकार ने गोल्ड कंट्रोल किया, कभी सोना गिरवी रखा और कभी आयात पर सख्ती की गई।
क्यों सरकार ने सोना खरीदने से बचने की सलाह दी?
मिडिल ईस्ट संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है। सरकार का मानना है कि अगर लोग बड़े पैमाने पर सोना खरीदेंगे तो गोल्ड इंपोर्ट बढ़ेगा। इससे विदेशी मुद्रा का और ज्यादा इस्तेमाल होगा। इसलिए सरकार फिलहाल तेल खरीद को प्राथमिकता देना चाहती है।
1962 युद्ध और गोल्ड कंट्रोल एक्ट
आजादी के बाद पहली बार बड़ा गोल्ड संकट 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सामने आया। युद्ध के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ा था। तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ लागू किया। इसके तहत 14 कैरेट से अधिक शुद्धता वाले गहनों पर रोक लगा दी गई। सरकार को उम्मीद थी कि इससे सोने की जमाखोरी और कालाबाजारी रुकेगी। लेकिन इसका उल्टा असर पड़ा और तस्करी बढ़ने लगी। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान भी झेलना पड़ा।
1991: जब भारत ने गिरवी रखा अपना सोना
भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा संकट 1991 में आया। उस समय देश के पास केवल दो हफ्ते के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा बची थी। ऐसे हालात में तत्कालीन सरकार ने 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के पास गिरवी रख दिया। यह फैसला बेहद कठिन माना गया था। उस दौर में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों ने बाद में देश में उदारीकरण का रास्ता खोला। लेकिन उस समय सोना गिरवी रखने का फैसला भारत की मजबूरी बन चुका था।
2013 में फिर बढ़ा संकट
2013 में डॉलर के मुकाबले रुपया तेजी से कमजोर हो रहा था। इसकी एक बड़ी वजह भारी गोल्ड इंपोर्ट था। तब यूपीए सरकार ने सोने के आयात शुल्क को 10% तक बढ़ा दिया। साथ ही RBI और सरकार ने 80:20 स्कीम लागू की। इस नियम के तहत आयात किए गए 100 किलो सोने में से 20 किलो सोना एक्सपोर्ट करना जरूरी था। इसका मकसद करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को कम करना था। हालांकि बाद में एनडीए सरकार ने इस स्कीम को खत्म कर दिया। सरकार का कहना था कि इससे तस्करी बढ़ रही थी।
अब फिर गोल्ड बना सरकार की रणनीति का हिस्सा
एक बार फिर वैश्विक तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच भारत अपनी आर्थिक रणनीति में गोल्ड को अहम फैक्टर मान रहा है। सरकार चाहती है कि विदेशी मुद्रा भंडार का ज्यादा इस्तेमाल तेल आयात में हो, न कि अतिरिक्त गोल्ड खरीद में। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से अपील की है कि संभव हो तो अगले एक साल तक सोना खरीदने से बचें। भारत की आर्थिक यात्रा में सोना सिर्फ गहना नहीं रहा, बल्कि कई बार संकटमोचक बनकर सामने आया है।