NFHS-6 रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में बच्चों का पूर्ण टीकाकरण 83.8% से बढ़कर 87.1% हो गया है। साथ ही कुपोषण और स्टंटिंग में भी कमी दर्ज की गई है।
भारत में बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी तस्वीर लगातार बेहतर होती दिख रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-6 (NFHS-6) के ताजा आंकड़ों में यह सामने आया है कि देश में बच्चों का पूर्ण टीकाकरण बढ़कर 87.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। वहीं, कुपोषण और स्टंटिंग जैसे गंभीर संकेतकों में भी गिरावट दर्ज की गई है। यह सर्वे 2023-24 के दौरान देश के करीब 6.79 लाख घरों में किया गया, जिसमें 715 जिलों को शामिल किया गया। रिपोर्ट बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और टीकाकरण की स्थिति पर एक व्यापक तस्वीर पेश करती है।
टीकाकरण में लगातार सुधार, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भरोसा बढ़ा
NFHS-6 के मुताबिक 12 से 23 महीने की उम्र के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण दर 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गई है। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि देश में यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम का असर धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। अब समझिए, सबसे अहम बात यह है कि लगभग 95.6 प्रतिशत टीकाकरण सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए हो रहा है। यह आंकड़ा बताता है कि आम लोगों का भरोसा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक रोटावायरस और मीजल्स जैसी बीमारियों के टीकों में भी बड़ी बढ़ोतरी हुई है, जो भविष्य में बच्चों की सेहत के लिए बेहद अहम है।
कुपोषण और स्टंटिंग में गिरावट, लेकिन चुनौती अभी बाकी
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि बच्चों में कुपोषण के मामलों में कमी आई है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत पर आ गई है। इसके अलावा गंभीर वेस्टिंग (Severe wasting) के मामलों में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, मामूली सुधार वाले संकेतक यह बताते हैं कि समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यही सवाल अब उठ रहा है कि क्या पोषण योजनाओं का असर गांव-गांव तक समान रूप से पहुंच पा रहा है या नहीं।
शिशु पोषण और फीडिंग प्रैक्टिस में भी सुधार
NFHS-6 में शिशु पोषण से जुड़ी आदतों में भी सुधार देखा गया है। छह से आठ महीने के बच्चों में पूरक आहार के साथ स्तनपान का चलन बढ़ा है। इसके अलावा जन्म के पहले घंटे में स्तनपान कराने की दर में भी सुधार हुआ है, जो नवजात शिशु स्वास्थ्य के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है। फिलहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव जागरूकता और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जमीनी मेहनत का नतीजा है।