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शराब घोटाला मामले में केजरीवाल- सिसोदिया बरी

शराब घोटाला मामले में कैसे बरी हुए केजरीवाल-सिसोदिया, कोर्ट ने क्यों दिया फैसला

राउज एवेन्यू कोर्ट ने सबूतों को कमजोर और अपर्याप्त बताते हुए केजरीवाल-सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी किया। ‘गंभीर संदेह’ की कसौटी भी पूरी नहीं हुई।


शराब घोटाला मामले में कैसे बरी हुए केजरीवाल-सिसोदिया कोर्ट ने क्यों दिया फैसला

दिल्ली के चर्चित शराब घोटाला मामले में शुक्रवार को बड़ा मोड़ आया, जब दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है, उन्हें साबित करने के लिए ठोस, विश्वसनीय और प्रत्यक्ष सबूत भी होने चाहिए। अदालत के मुताबिक अभियोजन पक्ष इस कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।

सबूत क्यों नहीं टिक पाए?

कोर्ट ने माना कि जांच एजेंसी की ओर से पेश की गई सामग्री आरोप तय करने के स्तर की भी नहीं थी। केजरीवाल का नाम मुख्य रूप से एक गवाह (PW-225) के देर से दिए गए बयान में सामने आया, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं थी। अदालत ने कहा कि केवल एक असमर्थित बयान के आधार पर आपराधिक साजिश स्थापित नहीं की जा सकती।

केजरीवाल पर कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि गंभीर आरोप हैं तो उनके समर्थन में पुख्ता सबूत भी होने चाहिए। केजरीवाल को मुख्य साजिशकर्ता बताने का दावा बिना पुख्ता सबूतों के टिक नहीं पाता है। यदि बिना ठोस आधार के आरोप लगाए जाते हैं तो इससे सार्वजनिक पदों पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है। अदालत को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से आबकारी नीति में हेरफेर किया या किसी को अनुचित लाभ दिया।

सिसोदिया को क्यों मिली राहत?

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मनीष सिसोदिया को लेकर कोई आपराधिक मंशा जाहिर नहीं होती है। अभियोजन का मामला अदालत की जांच में टिक नहीं पाया। दस्तावेज और बयानों से प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श साबित होता है। साथ ही किसी आपराधिक मंशा (क्रिमिनल इंटेंट) के संकेत नहीं मिले। इसके अलावा बड़ी साजिश वाली थ्योरी में दम नजर नहीं आता। प्रॉसिक्यूशन की कहानी में आपसी विरोधाभास भी बहुत है।

अदालत ने कहा कि सीबीआई पहली नजर में भी मामला साबित नहीं कर पाई, इसलिए सिसोदिया को डिस्चार्ज किया जाता है।

चार्जशीट और जांच पर सख्त सवाल

सुनवाई के दौरान जज ने जांच अधिकारी से कई सवाल किए-

चार्जशीट के साथ कबूलनामे की कॉपी क्यों नहीं लगाई?

कानूनी राय अलग दस्तावेज के रूप में क्यों दाखिल नहीं की गई?

ईमेल से भेजी गई लीगल ओपिनियन की कॉपी क्यों नहीं जोड़ी गई?

क्या आपने खुद कानूनी राय पढ़ी?

जिन तीन कानूनी रायों का हवाला दिया गया, वे अभियोजन के पक्ष में नहीं हैं, फिर भी दावा क्यों?

अदालत ने टिप्पणी की कि चार्जशीट दाखिल करते समय सभी दस्तावेजों को ध्यान से देखना जरूरी है। दो गवाहों के बयान अभियोजन के दावे के उलट थे। जज ने कहा, 'मैं हैरान हूं, पहली बार देख रहा हूं कि चार्जशीट में इतनी कमियां हैं।'

‘गंभीर संदेह’ की कसौटी भी पूरी नहीं

अदालत ने कहा कि आरोप तय करने के लिए रिकॉर्ड में ऐसा सामग्री होना चाहिए जिससे ‘गंभीर संदेह’ पैदा हो। इस मामले में वह मानक भी पूरा नहीं हुआ। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ‘मांग’ (Demand) का स्पष्ट प्रमाण जरूरी है, जो यहां साबित नहीं हुआ।

CBI करेगी हाईकोर्ट में अपील

Central Bureau of Investigation (CBI) ने विशेष अदालत के फैसले के विरुद्ध दिल्ली हाईकोर्ट में अपील करने का निर्णय लिया है। एजेंसी का कहना है कि कुछ पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ और वे अनसुने आधारों को हाईकोर्ट के समक्ष रखेंगे। अदालत ने अंत में स्पष्ट किया कि केवल संदेह, राजनीतिक पद या आपसी संबंध के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। आपराधिक साजिश के लिए ठोस, विधिसम्मत और प्रत्यक्ष सामग्री अनिवार्य है। चूंकि यह मानक पूरा नहीं हुआ, इसलिए सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया।

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