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Raghav Chadha BJP Move Sparks Debate

राघव चड्ढा का BJP में जाना क्यों बना बड़ा सवाल? खुद के लाया ये बिल पास हो जाता तो घिर जाते नेता

राघव चड्ढा के बीजेपी में जाने के बाद उनका पुराना एंटी-डिफेक्शन बिल चर्चा में। क्या वही कानून आज उनके रास्ते में रुकावट बनता? जानिए पूरी कहानी।


राघव चड्ढा का bjp में जाना क्यों बना बड़ा सवाल खुद के लाया ये बिल पास हो जाता तो घिर जाते नेता

Politics News |

आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद रहे राघव चड्ढा का बीजेपी में जाना सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि एक गहरे विरोधाभास की कहानी बन गया है। जिस नेता ने कभी दल-बदल पर सख्त कानून की जरूरत बताई थी, वही अब मौजूदा नियमों के तहत पार्टी बदलते नजर आ रहे हैं। इससे राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

यह मामला इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि कुछ साल पहले राघव चड्ढा ने खुद संसद में ऐसा बिल पेश किया था, जो अगर पास हो जाता, तो आज उनका बीजेपी में विलय संभव ही नहीं होता। यही वजह है कि अब उनका पुराना बयान और वर्तमान कदम आमने-सामने खड़े दिख रहे हैं।

क्या है पूरा घटनाक्रम

राघव चड्ढा ने अन्य सांसदों के साथ मिलकर बीजेपी में विलय किया, जिसे राज्यसभा सचिवालय ने मान्यता दे दी। मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून के तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो यह वैध माना जाता है। इसी नियम के आधार पर यह पूरा घटनाक्रम कानूनी रूप से सही माना जा रहा है।

पुराना बिल क्यों बना चर्चा का केंद्र

साल 2022 में राघव चड्ढा ने राज्यसभा में एक निजी विधेयक पेश किया था, जिसका उद्देश्य दल-बदल कानून को और सख्त बनाना था। उस समय उन्होंने साफ कहा था कि मौजूदा कानून में कई खामियां हैं, जिनका फायदा उठाकर नेता राजनीतिक लाभ लेते हैं।

अगर वह कानून लागू होता तो तस्वीर अलग होती

उस प्रस्तावित बिल में दल-बदल करने वाले जनप्रतिनिधियों पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की बात कही गई थी। इसके अलावा पार्टी विलय के लिए जरूरी संख्या को दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई करने का सुझाव दिया गया था। अगर ये प्रावधान लागू होते, तो वर्तमान परिस्थितियों में इस तरह का विलय बेहद मुश्किल हो जाता।

अब क्यों उठ रहे हैं राजनीतिक सवाल

अब जब वही नेता मौजूदा कानून का इस्तेमाल कर पार्टी बदल चुके हैं, तो राजनीतिक विरोधी इसे मुद्दा बना रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ संवैधानिक प्रक्रिया का पालन है या फिर राजनीतिक सुविधा के अनुसार रुख बदलना। यही कारण है कि यह मामला सिर्फ एक दल-बदल नहीं, बल्कि सिद्धांत बनाम राजनीति की बहस में बदल गया है।

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