NEET UG 2026 में सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS सीट के लिए जरूरी स्कोर क्या है। जानिए कैटेगरी वाइज कटऑफ और एडमिशन की पूरी जानकारी।
देशभर में लाखों मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए नीट यूजी परीक्षा बेहद अहम मानी जाती है। यही परीक्षा डॉक्टर बनने का रास्ता तय करती है। हर साल की तरह इस बार भी छात्रों के मन में एक सवाल बना हुआ है। सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस सीट के लिए कितने अंक जरूरी होंगे।
दरअसल, 03 मई 2026 को होने वाली नीट यूजी परीक्षा से पहले सुरक्षित स्कोर को लेकर चर्चा तेज हो गई है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कटऑफ का स्तर भी लगातार ऊपर जा रहा है।
सरकारी MBBS सीट के लिए कितना स्कोर चाहिए
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला अब पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। खासकर ऑल इंडिया कोटा के तहत मुकाबला काफी कड़ा रहता है। यहां देशभर के अभ्यर्थी एक साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। आंकड़ों के आधार पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 620 से 650 अंक के बीच स्कोर को सुरक्षित माना जा रहा है। शीर्ष संस्थानों के लिए यह स्कोर 700 या उससे अधिक तक भी जा सकता है।
स्टेट कोटा में अलग-अलग है स्थिति
सरकारी मेडिकल कॉलेजों की 85 प्रतिशत सीटें राज्य कोटा के तहत भरी जाती हैं। इसमें कटऑफ हर राज्य के अनुसार अलग होता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों में कटऑफ अपेक्षाकृत अधिक रहता है। यहां 600 से 615 अंक के आसपास भी सरकारी सीट मिलना कठिन माना जाता है। वहीं, कुछ पहाड़ी और दक्षिण भारतीय राज्यों में 570 से 590 अंकों के बीच भी प्रवेश की संभावना देखी जाती है।
कैटेगरी के हिसाब से संभावित कटऑफ
नीट यूजी में आरक्षण नीति के अनुसार अलग-अलग वर्गों के लिए कटऑफ भी अलग होता है। संभावित आंकड़े इस प्रकार हैं:
जनरल/ईडब्ल्यूएस: 610 से 630 अंक
ओबीसी: 600 से 620 अंक
एससी: 500 से 520 अंक
एसटी: 480 से 500 अंक।
ये आंकड़े हर साल प्रश्न पत्र के स्तर और अभ्यर्थियों की संख्या के आधार पर बदल सकते हैं।
कटऑफ किन फैक्टर्स पर निर्भर करता है
नीट यूजी का कटऑफ कई प्रमुख कारकों पर निर्भर करता है। परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या इसका पहला आधार होता है। संख्या बढ़ने पर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है। प्रश्न पत्र का कठिनाई स्तर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कठिन पेपर होने पर कटऑफ नीचे आ सकता है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध सीटों की संख्या भी कटऑफ को प्रभावित करती है।
सरकारी मेडिकल कॉलेज क्यों रहते हैं चर्चा में
सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस निजी संस्थानों की तुलना में कम होती है। इसके कारण इनकी मांग अधिक रहती है। यहां मरीजों की संख्या ज्यादा होने से छात्रों को बेहतर क्लीनिकल अनुभव मिलता है। इंटर्नशिप के दौरान मिलने वाला स्टाइपेंड और डिग्री की प्रतिष्ठा भी इन्हें प्रमुख विकल्प बनाती है।