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What is Under-Recovery in Oil Sector?

अर्थव्यवस्था के लिए झटका है 'अंडर रिकवरी'

अंडर-रिकवरी क्या है और इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है? जानिए तेल कंपनियों, सरकार और आम लोगों पर इसके प्रभाव की पूरी कहानी।


अर्थव्यवस्था के लिए झटका है अंडर रिकवरी

'अंडर-रिकवरी' पेट्रोलियम क्षेत्र का एक तकनीकी शब्द है, जिसे सरल भाषा में 'लागत से कम कीमत पर बेचना' कह सकते हैं। जब भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियां आईओसीएल, बीपीसीएल, एचपीसीएल अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगा कच्चा तेल खरीदती हैं, लेकिन घरेलू बाजार (देश के भीतर) में पेट्रोल, डीजल या गैस को उस बढ़ी हुई लागत के अनुपात में महंगा नहीं बेच पाती, तो उन्हें जो नुकसान होता है, उसे ही अंडर-रिकवरी कहा जाता है।

यह सामान्य 'घाटे' से कैसे अलग है?

अक्सर लोग इसे शुद्ध घाटा मान लेते हैं, लेकिन इसमें सूक्ष्म अंतर है। अंडर-रिकवरी, यह वह अंतर है जो 'अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमत' और 'घरेलू बिक्री कीमत' के बीच होता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से 1 लीटर डीजल की लागत 100 रुपए आनी चाहिए, लेकिन सरकार महंगाई को रोकने के लिए कंपनियों को निर्देश देती है कि वे इसे 90 रुपए में ही बेचें। यहाँ जो 10 रुपए का अंतर है, वह 'अंडर-रिकवरी' है।

अंडर-रिकवरी क्यों होती है?

भारत में ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों से जुड़ी हुई हैं। लेकिन जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं (जैसे वर्तमान युद्ध संकट के समय), तो सरकार आम जनता को महंगाई की मार से बचाने के लिए कंपनियों को कीमतें बढ़ाने से रोक देती है। इसका परिणाम यह होता है, कंपनियां महंगा तेल खरीदती है और सस्ता बेचती हैं।

वर्तमान संकट में इसकी गंभीरता

वर्तमान में अमेरिका-ईरान युद्ध और सप्लाई चेन टूटने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल बहुत महंगा है ।यदि कंपनियां अपनी पूरी लागत वसूलने लगें (अंडर-रिकवरी खत्म करें), तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें अचानक 25 से 30 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने 'संयम' की अपील की है। यदि हम कम तेल इस्तेमाल करेंगे, तो कंपनियों को कम तेल आयात करना पड़ेगा और उनकी अंडर-रिकवरी' या वित्तीय बोझ कम होगा। संक्षेप में, अंडर-रिकवरी देश की अर्थव्यवस्था को लगने वाला वह 'झटका' है जिसे सरकार और तेल कंपनियां सहती हैं ताकि आम नागरिक की जेब पर सीधा असर न पड़े। लेकिन इसकी एक सीमा होती है। यदि यह बहुत ज्यादा बढ़ जाए, तो देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाता है और देश की आर्थिक रेटिंग गिर सकती है।

इसका भुगतान कौन करता है?

अंडर-रिकवरी का बोझ तीन हिस्सों में बंटता है

सरकार- सरकार बजट के माध्यम से कंपनियों को 'सब्सिडी' (नकद सहायता) देती है।

तेल कंपनियां - कंपनियां खुद इस बोझ को वहन करती हैं, जिससे उनके मुनाफे में भारी कमी आती है। तेल उत्पादक कंपनियां जैसे ओएनजीसी-कभी-कभी सरकार कच्चा तेल निकालने वाली कंपनियों से कहती है, कि वे रिफाइनिंग कंपनियों को सस्ते दाम पर कच्चा तेल दें ताकि बोझ साझा हो सके।

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