यूपी के किसान अब लगाएंगे ‘पोमैटो’, एक पौधा… ऊपर टमाटर, नीचे आलू

Update: 2026-02-04 04:35 GMT

उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए खेती में एक नया और दिलचस्प प्रयोग सामने आया है। गोरखपुर में पहली बार ऐसे पौधे का प्रदर्शन किया गया है, जिसमें एक ही पौधे से दो फसलें मिलती हैं ऊपर टमाटर और जमीन के नीचे आलू। इस अनोखे पौधे को नाम दिया गया है पोमैटो। महायोगी गोरखनाथ कृषि विज्ञान केंद्र में जब यह पौधा क्यारी और गमलों में लगाया गया, तो देखने वालों की भीड़ लग गई। किसान इसे देखकर हैरान भी थे और उत्साहित भी, क्योंकि कम जगह में दोगुनी उपज की संभावना अब हकीकत बनती दिख रही है।

एक पौधा, दो फसलें

पोमैटो कोई जेनेटिक इंजीनियरिंग या जीएम फसल नहीं है। इसे साधारण ग्राफ्टिंग तकनीक से तैयार किया गया है। आलू और टमाटर दोनों सोलानेसी (नाइटशेड) परिवार के पौधे हैं, इसलिए इन्हें आपस में जोड़ना आसान होता है.इस तकनीक में नीचे का हिस्सा आलू का होता है, जो जमीन के भीतर कंद बनाता है, जबकि ऊपर का हिस्सा टमाटर का रहता है, जहां फल लगते हैं। नतीजा एक ही पौधे से दो अलग-अलग सब्जियों की खेती।

वाराणसी के वैज्ञानिकों की बड़ी भूमिका

इस नवाचार को विकसित किया है भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR), वाराणसी के वैज्ञानिक डॉ. अनंत बहादुर और डॉ. अनीश कुमार सिंह ने। IIVR अब तक 100 से ज्यादा नई सब्जी किस्में विकसित कर चुका है, जिनमें टमाटर, बैंगन, भिंडी, लोबिया, तोरी जैसी प्रमुख सब्जियां शामिल हैं. गोरखपुर में यह पहला मौका है जब पोमैटो का फील्ड लेवल पर प्रदर्शन किया गया है।

अगले साल मिलेगा किसानों को प्रशिक्षण

कृषि विज्ञान केंद्र की योजना है कि अगले वर्ष किसानों को पोमैटो तैयार करने का पूरा प्रशिक्षण दिया जाए। ताकि वे खुद ग्राफ्टिंग करके यह पौधा तैयार कर सकें और कम जमीन में ज्यादा उत्पादन ले सकें. विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह तकनीक खासतौर पर फायदेमंद साबित हो सकती है।

पोषण के लिहाज से भी फायदेमंद

पोमैटो सिर्फ उत्पादन ही नहीं, पोषण के लिहाज से भी खास है. आलू में कार्बोहाइड्रेट भरपूर होता है, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है और फाइबर पाचन को बेहतर करता है. टमाटर विटामिन-सी का अच्छा स्रोत है, जो इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करता है. अगर प्रशिक्षण और तकनीक सही तरीके से खेतों तक पहुंची, तो आने वाले समय में यूपी के कई जिलों में पोमैटो की खेती आम हो सकती है। अब देखना यह है कि किसान इसे कितनी तेजी से अपनाते हैं।

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