मकर संक्रांति 2026: 23 साल बाद दुर्लभ संयोग, जून तक संभलकर रहना होगा
मकर संक्रांति 2026 पर 23 साल बाद दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग बन रहे हैं, भूत जाति, बाघ वाहन और ग्रहों की स्थिति जून तक सतर्क रहने का संकेत।
मकर संक्रांति को सिर्फ पर्व मान लेना शायद इस बार ठीक नहीं होगा । भोपाल निवासी वरिष्ठ ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, वर्ष 2026 की मकर संक्रांति सामान्य नहीं है ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर वे इसे बीते 23 वर्षों में बना सबसे असामान्य और संवेदनशील संयोग मानते हैं। उनका कहना है कि यह संक्रांति न केवल एकादशी के साथ पड़ रही है, बल्कि इसका स्वरूप, वाहन और ग्रह स्थिति तीनों ही वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल के संकेत दे रहे हैं ।
‘भूत जाति’ की संक्रांति, बाघ बना वाहन
पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बताते हैं कि इस वर्ष मकर संक्रांति ‘भूत जाति’ की है इसका वाहन बाघ और उप-वाहन घोड़ा माना गया है जो ज्योतिष शास्त्र में आक्रामक और तीव्र ऊर्जा के प्रतीक हैं ।उनके अनुसार, जब संक्रांति का स्वरूप उग्र होता है, तो उसका प्रभाव समाज के ऊपरी वर्ग और सत्ता संरचनाओं पर अधिक पड़ता है।
किन पर पड़ेगा सीधा असर?
- आर्थिक रूप से समृद्ध देश
- सत्ता और सैन्य शक्ति वाले राष्ट्र
- उच्च वर्ग और प्रभावशाली संस्थान
पंडित शर्मा मानते हैं कि इस दौरान सत्ता परिवर्तन, आर्थिक दबाव, आंतरिक असंतोष और सामाजिक उथल-पुथल जैसी स्थितियां उभर सकती हैं । उनके अनुसार मकर संक्रांति पर सूर्य देव अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं और यहीं से उत्तरायण आरंभ होता है ।शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं की दिशा से जोड़ा गया है. यह आत्मिक उन्नति के लिए शुभ माना जाता है लेकिन वे स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक रूप से शुभ समय होने के बावजूद, ग्रहों की वर्तमान स्थिति भौतिक जगत में तनाव और संघर्ष बढ़ा सकती है।
गुरु और शनि की स्थिति क्यों बढ़ा रही है चिंता?
पंडित शर्मा के मुताबिक, 2026 के पूर्वार्ध में दो सबसे प्रभावशाली ग्रह गुरु और शनि सहज अवस्था में नहीं हैं देवगुरु बृहस्पति इस समय अतिचारी हैं यानी उनकी गति असामान्य रूप से तेज़ है । हालांकि जून 2026 में वे अपनी उच्च राशि कर्क में प्रवेश करेंगे लेकिन तब तक उनका शुभ प्रभाव अधूरा रहेगा ।शनि देव का मीन राशि में गोचर धर्म, न्याय और कर्म से जुड़े विषयों में कठोरता लाता है । इसलिए यह समय कर्मों का हिसाब लेने वाला है जो जैसा करेगा, वैसा ही फल पाएगा।
राहु-केतु और बढ़ता वैचारिक टकराव
राहु का कुंभ राशि में और केतु का सिंह राशि में होना भी चिंता का विषय है पंडित जी के अनुसार, यह योग धार्मिक कट्टरता, वैचारिक ध्रुवीकरण और वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा सकता है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए गठबंधन और समीकरण, विशेषकर मुस्लिम देशों के बीच उभर सकते हैं, जिससे भू-राजनीतिक तनाव गहरा सकता है ।
जून 2026 तक क्यों जरूरी है विशेष सावधानी?
पंडित शर्मा का कहना है कि जनवरी से जून 2026 तक का समय सबसे अधिक संवेदनशील रहेगा हालांकि जून में गुरु के कर्क राशि में जाने से कुछ राहत मिल सकती है लेकिन यह स्थायी नहीं होगी । अक्टूबर के अंत में गुरु का सिंह राशि में प्रवेश फिर से संतुलन बिगाड़ सकता है । उनके शब्दों में ‘बाघ’ और ‘घोड़े’ पर सवार यह संक्रांति तेज़ भी है और अप्रत्याशित भी इसलिए वर्ष 2026वैचारिक संघर्ष सत्ता की खींचतान धार्मिक तनाव और वैश्विक अस्थिरता का वर्ष बन सकता है ऐसे में जून 2026 तक शांति विवेक और संतुलित नीतियां ही सबसे बड़ा बचाव होंगी।