प्रेमानंद महाराज ने चेतायाः अभी कौन- कौन से दुख सहने हैं बाकी घोर कलयुग आने को है…
प्रेमानंद महाराज ने कलयुग को लेकर चेताया रिश्तों, भरोसे और प्रकृति पर बढ़ता संकट जानिए बचाव का उपाय।
आज के समय में रिश्ते अक्सर उतने भारी नहीं लगते जितने कभी हुआ करते थे । फोन की स्क्रीन पर उंगलियां जितनी तेज़ चलती हैं, दिल उतना ही धीमा होता जा रहा है । ऐसे दौर में जब प्रेमानंद महाराज कलयुग की बात करते हैं, तो लोग सिर्फ़ सुनते नहींठहरकर सोचने लगते हैं ।महाराज कहते हैं कि कलयुग कोई दूर की भविष्यवाणी नहीं है । वह धीरे-धीरे हमारे व्यवहार, रिश्तों और सोच में उतर चुका है । शायद इसी वजह से उनकी बातें आज ज़्यादा चुभती हैं ।
जो आज असामान्य है, वही कल की आदत बन सकता है
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, कलयुग अचानक नहीं आता । वह धीरे-धीरे समाज की नसों में घुलता है । जिन घटनाओं को आज हम कभी-कभार कहकर टाल देते हैं, वही आगे चलकर आम हो सकती हैं ।आज माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत कम होती जा रही है । साथ रहते हुए भी लोग एक-दूसरे से कटे हुए हैं । भाई-बहन के रिश्तों में वह आत्मीयता कम दिखती है जो पहले स्वाभाविक थी । भरोसा शक में बदल रहा है, और अपनापन औपचारिकता में ।
महाराज मानते हैं कि यह सिर्फ़ शुरुआत है
प्रेमानंद महाराज की सबसे गंभीर चेतावनी यहीं आकर रुकती है । उनका कहना है कि आने वाले समय में इंसान इतना स्वार्थी हो सकता है कि रिश्तों की सीमाएं टूटने लगेंगी । लालच और वासना के आगे मर्यादा कमजोर पड़ जाएगी । उनके शब्दों मेंवह दिन भी आ सकता है जब बहन और बेटी का फर्क लोगों के मन से मिट जाए ।यह सुनना आसान नहीं है, लेकिन नज़रें चुराना भी मुश्किल ।
समाज के साथ-साथ प्रकृति भी संकेत दे रही है
महाराज की बात केवल रिश्तों तक सीमित नहीं रहती । वह प्रकृति को भी इस बदलाव का साक्षी मानते हैं ।उन्होंने उदाहरण दिया कि आज वृंदावन जैसी पवित्र भूमि पर परिक्रमा करने के बाद प्यास लगे, तो बोतलबंद पानी खरीदना पड़ता है । कभी जिस गंगा को अमृत समान माना गया, उसका जल अब वैसा निर्मल नहीं रहा ।यह सिर्फ़ पर्यावरण का संकट नहीं है । यह हमारे सामूहिक व्यवहार का परिणाम है ।
भक्त का सवाल, जो हर किसी के मन में है
एक भक्त ने पूछा- महाराज क्या सच में वो समय आएगा जब अपने ही अपनों को दुख देंगे? महाराज का उत्तर शांत था उन्होंने कहा कि पिता द्वारा बच्चों का शोषण अपनों से विश्वासघात और रिश्तों में छलये सब कलयुग के संकेत हैं । जो आज दुर्लभ लगता है वही आने वाले समय में सामान्य हो सकता है इतनी कठोर सच्चाइयों के बीच प्रेमानंद महाराज का मानना है कि इस दौर में अगर कुछ बचा सकता है, तो वह है भगवान का नाम । नाम-स्मरण से मन स्थिर रहता है, व्यक्ति अपने कर्तव्यों से नहीं भटकता और भीतर एक नैतिक ढाल बनती है ।यह कोई पलायन नहीं, बल्कि आत्म-रक्षा है ।महाराज कहते हैं ध्यान, जप और स्मरण आज के समय के सबसे बड़े साधन हैं । यही हमें लालच, क्रोध और अंधे स्वार्थ से बचा सकते हैं । कलयुग की आहट डराती ज़रूर है लेकिन प्रेमानंद महाराज का संदेश साफ़ हैअगर भीतर आस्था ज़िंदा है तो अंधेरे समय में भी इंसान रास्ता खोज सकता है ।