गीता को जानें: सृष्टिचक्र सहकार और सहयोग पर आधारित है

ओमप्रकाश श्रीवास्तव

Update: 2026-01-25 04:44 GMT

जब हम अपने नियत कर्म इस भाव से करते हैं कि यह मेरा कर्तव्य है, इसके पीछे मेरा नहीं बल्कि जगत् का हित है, मैं इस संसार-चक्र को चलाने में सहयोगी हूँ, तब वह कर्म यज्ञ बन जाता है। यज्ञ के उद्देश्य से, अनासक्त भाव से किया गया कर्म मुक्ति का साधन बन जाता है। अन्यत्र कर्म का अर्थ ही है यज्ञ भाव के अलावा किए गए कर्म, अर्थात् वे कर्म जो कामना के उद्देश्य से किए जाते हैं और वे कर्म जिन्हें करने की शास्त्रों में मनाही की गई है। इस श्लोक में भगवान् यज्ञार्थ कर्म भी मुक्तसंग होकर, अर्थात् अनासक्त भाव से करने का आदेश दे रहे हैं।

अनासक्ति दोनों स्थानों पर होनी चाहिए कर्म में और उसके फल में। हम कर्तव्य समझकर पूरी कुशलता और उत्साह से कर्म करेंगे, उसका जो भी फल आए, उसमें समभाव रखेंगे। अनुकूल या प्रतिकूल फल आने पर विचलित नहीं होंगे। यह फल में अनासक्ति है। कई बार हम कर्म से ही राग कर लेते हैं।

उदाहरण के लिए, यज्ञ के भाव से विद्यालय चलाया कि बच्चों को अच्छी, निःशुल्क शिक्षा प्रदान करूँगा। परन्तु विद्यालय के कार्य में इतने रम गए कि जब कभी उसे छोड़ने की बात आई, तो कष्ट होने लगा। “हाय! इतनी मेहनत से विद्यालय बनाया, इससे मुझे यश और सम्मान मिला, इसे छोड़कर मैं कैसे दूर जा सकता हूँ?” यह कर्म से आसक्ति है। हमें कर्म से भी नहीं बँधना है। कभी वह कर्म छोड़ना पड़े, तो एक क्षण में उससे अलग हो जाना चाहिए।

सहकार और सहयोग की मूल अवधारणा पर ही सृष्टि संचालित है। यह बताते हुए भगवान् कहते हैं “सृष्टि के प्रारंभ में यज्ञ के साथ-साथ प्रजा को उत्पन्न करके प्रजापति ने कहा कि इससे तुम लोग फलो-फूलो। यह तुम्हारे लिए अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति करने वाला बने” (गीता 3.10)। सनातन धर्म के अनुसार भगवान् की आज्ञा से ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं। कोई भी माता-पिता अपनी संतान के कल्याण के लिए निरंतर सचेत रहते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मा भी अपनी प्रजा के कल्याण के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ करते हैं।

ब्रह्मा की प्रजा के अंतर्गत देवता, पितर, मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति आदि सभी आते हैं। मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी प्राणी प्रकृति के निर्धारित नियमों के अनुसार अनजाने में ही सृष्टि के यज्ञचक्र में अपना योगदान देते हैं, परन्तु मनुष्य के पास बुद्धि-विवेक है और कर्म करने का अधिकार है, इसलिए वह चाहे तो इस चक्र में योगदान दे या न दे। इसी कारण ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में ही वेदों के माध्यम से मनुष्यों के कर्तव्यकर्मों की रचना कर दी, ताकि मनुष्य को मार्गदर्शन मिल सके और वह उन्हें करने के लिए प्रेरित हो। इससे सम्पूर्ण सृष्टि का यज्ञचक्र संतुलित रहेगा, सभी प्राणियों को जीवन-निर्वाह हेतु आवश्यक सामग्री प्राप्त होगी और सबका कल्याण होगा।

इस कर्तव्यकर्म-रूपी यज्ञ के द्वारा पारस्परिक सहयोग करना है। इसका परिणाम होगा सबका कल्याण। भगवान् कहते हैं “तुम लोग इसके द्वारा देवताओं का पोषण करो, वे देवता तुम्हारा पोषण करें। एक-दूसरे का कल्याण करते हुए तुम उच्चतम कल्याण प्राप्त करोगे” (गीता 3.11)। सभी प्राणियों की उन्नति और कल्याण ही हमारा ध्येय होना चाहिए। ‘परस्परं भावयन्तः’ से भगवान् का तात्पर्य है कि हम परस्पर अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करें, जिसका परिणाम होगा एक-दूसरे की उन्नति।

कर्तव्यकर्म का पालन बदले में किसी लाभ की आशा के बिना, केवल कर्तव्य समझकर करना है। अपने कर्तव्य का पालन करने से दूसरे के अधिकार की रक्षा होती है। हमारे संविधान में राज्य और नागरिकों के अधिकार भी हैं और कर्तव्य भी। वर्तमान समय में अधिकारों की तुलना में कर्तव्यों पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि हर व्यक्ति दूसरे से अपेक्षा करता है और स्वयं कुछ नहीं करना चाहता। दूसरे की प्रगति में सहायता करना तो दूर, अपितु ईर्ष्या करना भारत के जनमानस की एक बड़ी विडम्बना है।

स्वामी विवेकानन्द इससे अत्यंत व्यथित थे। उन्होंने बहुत कठोर शब्दों में कहा है “क्या कारण है कि हिन्दू राष्ट्र अपनी अद्भुत बुद्धि और अन्य गुणों के रहते हुए भी टुकड़े-टुकड़े हो गया? मैं इसका उत्तर दूँगा—ईर्ष्या। कभी भी कोई जाति एक-दूसरे से क्षुद्रभाव से ईर्ष्या करने वाली या एक-दूसरे के सुयश से ऐसी डाह करने वाली नहीं होगी, जैसी कि यह अभागी हिन्दू जाति…” गीता के पारस्परिक सहकार और सहयोग के संदेश का व्यवहारिक जीवन में उपयोग ही इस रोग की औषधि है।

गीता में भगवान् प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। ये देव-रूपी सूक्ष्म शक्तियाँ मनुष्य को उसके कर्तव्यकर्मों के लिए आवश्यक सामग्री और परिस्थितियाँ प्रदान करती हैं तथा उसके कर्मों का फल देती हैं। देव स्वयं भी भोगयोनि होने के कारण अपने पूर्वकृत शुभ कर्मों का फल भोगते हैं। सृष्टिचक्र में अपना योगदान देने, पारस्परिक उन्नति करने और अपना कल्याण करने के लिए किसी नए कार्य को करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जो कर्तव्यकर्म निर्धारित हैं, उन्हें ही कर्म के अभिमान और फल की आसक्ति का त्याग कर करना है।

मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी प्राणी प्रकृति के नियमों के अनुसार अनजाने में ही सृष्टि के यज्ञचक्र में अपना योगदान देते हैं, परन्तु मनुष्य के पास बुद्धि-विवेक और कर्म करने की स्वतंत्रता है। इसलिए ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में ही वेदों के माध्यम से मनुष्यों के कर्तव्यकर्म निर्धारित किए, ताकि उन्हें उचित मार्गदर्शन मिल सके।

इसी भाव का विस्तार करते हुए भगवान् आगे कहते हैं “यज्ञ से पोषित देवता वास्तव में तुम्हें इच्छित भोग पदार्थ देंगे। उनके द्वारा दिए गए इन पदार्थों को जो बदले में कुछ दिए बिना भोगता है, वह वास्तव में चोर है” (गीता 3.12)। भोग सूक्ष्म शक्तियों की कृपा से प्राप्त होता है। देवता हमें देते हैं, तो हमें उनके प्रति भी अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। भोगों का भाग पहले देवों को अर्पित करना चाहिए।

सृष्टि में सभी का स्वभाव परोपकार करना है। वृक्ष अपना फल नहीं खाता, कुआँ अपना जल नहीं पीता, माँ अपना दूध नहीं पीती। पूरी सृष्टि का केन्द्रीय भाव है दूसरों को सुख कैसे मिले। माता-पिता ने शरीर दिया, देवताओं ने कर्म की सामग्री और उसका फल दिया, ऋषियों ने ज्ञान-विज्ञान दिया, प्राणियों और वनस्पतियों ने धरती को रहने योग्य बनाया और समाज के अन्य लोगों ने हमें सहयोग दिया तभी हम आज इस स्थिति में हैं।

इन सबके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और इस प्रक्रिया को निरंतर चलाए रखने के लिए ही दैनिक पंचयज्ञों का विधान किया गया है, जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है। हम समष्टि का अंग हैं, अतः सबके कल्याण में ही हमारा कल्याण निहित है। यदि इस चक्र में एक भी पुर्जा अवरोध उत्पन्न करता है, तो सम्पूर्ण सृष्टिचक्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अकेले स्वार्थी होकर न तो हम अपना कल्याण कर सकते हैं और न ही जगत् का।

हमें शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, बल, योग्यता, धन और अधिकार सब संसार से प्राप्त हुए हैं। इनका उपयोग संसार के हित में करके ही हमें उन्नत होना है। जो लोग इन ऋणों से मुक्त हुए बिना भोजन और जीवन-निर्वाह की सामग्री वस्त्र, आवास, धन आदि का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं, उन्हें भगवान् ने चोर कहा है। जैसे चोर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ नहीं होता, जिसका सामान वह चुराता है, उसी प्रकार देवता, समाज और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ न होने वाले स्वार्थी लोग भी चोर हैं।

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