वीर सावरकर की तस्वीर हटाने की याचिका पर SC का फैसला, याचिकाकर्ता को लगी फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने संसद से वीर सावरकर की तस्वीर हटाने की याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई।

Update: 2026-01-13 12:25 GMT

नई दिल्ली: देश की सुप्रीम कोर्ट ने वीर सावरकर की तस्वीर हटाने वाली याचिका पर सुनवाई कर बड़ा फैसला सुनाया है। वीर सावरकर की तस्वीर को संसद के केंद्रीय कक्ष और अन्य सार्वजनिक स्थानों से हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने इस याचिका को न केवल खारिज किया, बल्कि याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार भी लगाई। पीठ ने याचिकाकर्ता को फटकारते हुए कहा कि इस तरह की याचिका अदालत का समय बर्बाद करती हैं।

दरअसल, रिटायर्ड सिविल सर्वेंट बालासुंदरम ने यह याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की बेतुकी और निरर्थक याचिकाएं दायर कर अदालत का कीमती समय बर्बाद किया जा रहा है। कोर्ट ने याचिका वापस लेने के लिए कहा है। यहां तक चेतावनी दी कि यदि याचिका पर आगे सुनवाई के लिए जोर दिया गया तो भारी जुर्माना लगाया जाएगा। कोर्ट ने एक लाख रुपये जमा करने के बाद ही सुनवाई की बात कही।

याचिकर्ता ने वापस ली पिटीशन

अदालत के सख्त रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सलाह दी कि सेवानिवृत्ति के बाद इस तरह की याचिकाओं में समय गंवाने के बजाय समाज के लिए कोई सार्थक और सकारात्मक कार्य करें।

वीर सावरकर को लेकर क्या कहा कोर्ट ने?

हालांकि कोर्ट ने इस मामले में विस्तृत टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को लेकर इस तरह की याचिकाएं स्वीकार नहीं की जा सकतीं, खासकर जब उनका कोई ठोस संवैधानिक आधार न हो।

कौन थे वीर सावरकर?

वीर विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी, विचारक और लेखक थे। उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक में हुआ था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ गतिविधियों के चलते उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में लंबी सजा काटनी पड़ी।

सावरकर हिंदू महासभा के संस्थापक नेताओं में शामिल रहे और उन्होंने हिंदुत्व की वैचारिक अवधारणा को विस्तार दिया। उनकी पुस्तक 'Hindutva: Who is a Hindu?' में हिंदू पहचान और संस्कृति को परिभाषित किया गया है।

हालांकि सावरकर के विचार और राजनीतिक दृष्टिकोण आज भी बहस का विषय बने हुए हैं, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को लेकर कोई मतभेद नहीं है। यही कारण है कि सार्वजनिक स्थलों पर उनकी तस्वीरों को लेकर उठाए गए सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।

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