कश्मीर एकजुटता दिवस का विरोधाभासः विदेशों में वकालत, घर में दमन
डॉ. शुजात अली कादरी
हर साल 5 फरवरी को पाकिस्तान ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ मनाता है। इस दिन रैलियां निकलती हैं, भाषण होते हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक गतिविधियां तेज होती हैं और मीडिया व सोशल मीडिया पर संगठित अभियान चलाए जाते हैं। आधिकारिक बयानों में मानवाधिकार, आत्मनिर्णय और नैतिक जिम्मेदारी जैसे शब्द बार-बार दोहराए जाते हैं।
लेकिन इस सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय प्रचार के पीछे एक गहरा और असहज विरोधाभास छिपा हुआ है। एक ओर पाकिस्तान खुद को कश्मीरियों के अधिकारों का सबसे बड़ा रक्षक बताता है, वहीं दूसरी ओर अपने ही नियंत्रण वाले इलाकों में राजनीतिक स्वतंत्रता, असहमति की आवाज और बुनियादी नागरिक अधिकारों को लगातार दबाता रहा है। यही वह बिंदु है, जो पाकिस्तान की पूरी कश्मीर वकालत को कठघरे में खड़ा करता है।
यह स्थिति एक जरूरी सवाल उठाती है-क्या कोई देश कश्मीर में मानवाधिकारों का विश्वसनीय पक्षधर हो सकता है, जब वही अधिकार वह अपने ही घर में नहीं देता? चयनात्मक आक्रोश और आधी सच्चाइयों की राजनीति
समय के साथ ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ एक सुव्यवस्थित राजनीतिक अभ्यास बन चुका है। विदेशी दूतावासों में सेमिनार होते हैं, प्रवासी समुदायों के जरिए प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म भावनात्मक नारों व चित्रों से भर दिए जाते हैं। उद्देश्य स्पष्ट है-कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीवित रखना और पाकिस्तान को नैतिक पक्ष के रूप में प्रस्तुत करना।
लेकिन यह पूरी कवायद चुनिंदा तथ्यों और आधी सच्चाइयों पर आधारित है। जहाँ जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की बातें पोस्टरों और भाषणों में छाई रहती हैं, वहीं पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में रहने वाले लोगों की वास्तविक स्थिति पर लगभग पूरी चुप्पी साध ली जाती है। यही चयनात्मक आक्रोश पाकिस्तान की नैतिक दलीलों को कमजोर करता है।
गिलगित-बाल्टिस्तानः बिना अधिकारों का इलाका
पाकिस्तान की कश्मीर कहानी की सबसे बड़ी चूक उसके अपने कब्जे वाले क्षेत्र हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान, जहाँ बीस लाख से अधिक लोग रहते हैं, आज तक किसी स्पष्ट संवैधानिक दर्जे से वंचित है। वहाँ के नागरिक पाकिस्तान के राष्ट्रीय चुनावों में मतदान नहीं कर सकते। उनकी विधानसभा के अधिकार सीमित हैं और नीति-निर्धारण में उनकी कोई वास्तविक भागीदारी नहीं है।
जो स्थानीय कार्यकर्ता संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक पहचान की मांग करते हैं, उन्हें अक्सर गिरफ्तारी, निगरानी और सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। यह सब उस समय और भी विडंबनापूर्ण लगता है, जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आत्मनिर्णय की बात करता है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में भी दमन
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में भी राजनीतिक अभिव्यक्ति पर कड़े नियंत्रण हैं। कानूनी व्यवस्थाओं के जरिए असहमति को अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है। आधिकारिक कश्मीर नीति पर सवाल उठाने या अधिक स्वायत्तता की मांग करने वालों को डराने-धमकाने, मुकदमे दर्ज करने और प्रशासनिक दबाव झेलने पड़ते हैं।
स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीमाएं हैं और इस्लामाबाद की नीतियों के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों को अक्सर बलपूर्वक रोका जाता है। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने जबरन गायब किए जाने, मीडिया पर रोक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने को लेकर बार-बार चिंता जताई है। लेकिन ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ के आयोजनों में इन रिपोर्टों का शायद ही कभी उल्लेख होता है।
नैतिक विश्वसनीयता का संकट
वैश्विक कूटनीति में नैतिक विश्वसनीयता की अहम भूमिका होती है। जो देश मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय वकालत करते हैं, उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने घर में भी उन्हीं मूल्यों का पालन करें। पाकिस्तान की यह चयनात्मक मानवाधिकार नीति अब अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों, पत्रकारों और नीति-निर्माताओं के बीच सवालों के घेरे में है।
बहुपक्षीय मंचों पर भी यह भरोसे की कमी साफ दिखाई देती है, जहाँ पाकिस्तान के दावों के साथ-साथ उसके अपने शासन रिकॉर्ड पर आत्ममंथन की मांग उठती रहती है। आंतरिक विरोधाभासों को नजरअंदाज करने वाली वकालत को अक्सर सिद्धांतपरक नहीं, बल्कि राजनीतिक दिखावा माना जाता है।
आज जिस रूप में कश्मीर एकजुटता दिवस मनाया जा रहा है, वह एक ऐसे विरोधाभास को उजागर करता है, जिसे पाकिस्तान अब और नजरअंदाज नहीं कर सकता। विदेशों में किया गया प्रचार, घर में जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब केवल नारों और आयोजनों से प्रभावित होने वाला नहीं है।
जब तक कथनी और करनी में यह अंतर बना रहेगा, 5 फरवरी एकजुटता का दिन कम और पाकिस्तान के बढ़ते विश्वसनीयता संकट की याद ज्यादा बनता रहेगा।
विदेशों में प्रचार, घर में जवाबदेही का विकल्प नहीं
कश्मीर के साथ सच्ची एकजुटता न तो प्रतीकात्मक हो सकती है और न ही चुनिंदा। इसके लिए हर स्थान और हर परिस्थिति में समान नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है। यदि पाकिस्तान वास्तव में कश्मीर के भविष्य में एक गंभीर और विश्वसनीय पक्षकार बनना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपने नियंत्रण वाले इलाकों में लोकतांत्रिक कमियों को दूर करना होगा।
गिलगित-बाल्टिस्तान को संवैधानिक दर्जा देना, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा करना और वास्तविक राजनीतिक बहुलता की अनुमति देनाये कदम पाकिस्तान की स्थिति को कमजोर नहीं करेंगे, बल्कि उसकी नैतिक विश्वसनीयता को मजबूत करेंगे।