छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान हुए कथित शराब घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सेवानिवृत्त आईएएस निरंजन दास सहित 30 अफसरों की संपत्ति कुर्क कर दी है। इस कार्रवाई के बाद अब तक अस्थायी रूप से अटैच की गई संपत्तियों की कीमत 382 करोड़ रुपए से अधिक हो गई है। इनमें ढेबर और बघेल परिवार की संपत्तियां समेत कुल 1041 अचल संपत्तियां शामिल हैं।
ED की तरफ से जारी बयान में बताया गया है कि तत्कालीन आबकारी आयुक्त आईएएस निरंजन दास समेत 30 आबकारी अधिकारियों की करीब 38.21 करोड़ की संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क किया गया है। ईडी के अनुसार, इस शराब घोटाले के कारण छत्तीसगढ़ के आबकारी खजाने को लगभग 2,883 करोड़ रुपए का भारी नुकसान हुआ है। एजेंसी ने यह आंकड़ा जांच में मिले नए तथ्यों और मनी ट्रेल के आधार पर तय किया है। जांच आगे बढ़ने के साथ ही इस राशि में वृद्धि की संभावना है।
81 आरोपियों में 9 की गिरफ्तारी
ईडी ने इस मामले में कुल 81 लोगों को आरोपी बनाया है, जिनमें नौकरशाह, राजनेता और कारोबारी शामिल हैं। इनमें से नौ प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें अनिल टूटेजा (पूर्व आईएएस), अरविंद सिंह, त्रिलोक सिंह ढिल्लों, अनवर देबर, अरुण पति त्रिपाठी (आईटीएस), कवासी लखमा (विधायक और तत्कालीन आबकारी मंत्री), चैतन्य बघेल (पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र), सौम्या चौरसिया (मुख्यमंत्री कार्यालय के पूर्व उप सचिव) और निरंजन दास (आईएएस) शामिल हैं। इनमें से कुछ को फिलहाल जमानत मिल चुकी है, जबकि अन्य न्यायिक हिरासत में हैं।
अटैच संपत्तियों में होटल, बंगले और कृषि भूमि शामिल
शराब घोटाले में ईडी द्वारा अटैच की गई संपत्तियों में रायपुर के जेल रोड स्थित होटल वेनिंगटन कोर्ट के साथ आलीशान बंगले, पॉश कॉलोनियों में फ्लैट, व्यावसायिक परिसर की दुकानें और बड़ी मात्रा में कृषि भूमि शामिल हैं। चल संपत्तियों में करोड़ों रुपए की सावधि जमा, विभिन्न बैंक खातों में जमा रकम, जीवन बीमा पॉलिसियां, शेयर और म्यूचुअल फंड में किया गया निवेश भी शामिल है।
शराब घोटाला कैसे किया गया
ईडी की चार्जशीट के अनुसार, आरोपियों ने शराब घोटाला तीन तरीकों से किया, जिन्हें एजेंसी ने ए, बी और सी श्रेणी में वर्गीकृत किया है.
A-अवैध कमीशन: सरकारी बिक्री पर शराब आपूर्तिकर्ताओं से रिश्वत ली जाती थी, जिसे राज्य द्वारा भुगतान की जाने वाली 'लैंडिंग कीमत' को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर सुगम बनाया जाता था। इससे रिश्वत का वित्तपोषण प्रभावी रूप से सरकारी खजाने से होता था।
B -अघोषित बिक्री: एक समानांतर प्रणाली के तहत नकली होलोग्राम और नकद भुगतान से खरीदी गई बोतलों का उपयोग करके सरकारी दुकानों के माध्यम से 'बिना हिसाब-किताब वाली' देसी शराब बेची जाती थी, जिससे सभी उत्पाद शुल्क और करों से बचा जाता था।
C - कार्टल कमीशन: राज्य में बाजार हिस्सेदारी बनाए रखने और परिचालन लाइसेंस सुरक्षित करने के लिए शराब कंपनियों द्वारा वार्षिक रिश्वत दी जाती थी।
एफएल-10: विदेशी शराब निर्माताओं से कमीशन वसूलने के लिए एक नई लाइसेंस श्रेणी शुरू की गई थी, जिसमें मुनाफे का 60 प्रतिशत हिस्सा सिंडिकेट को जाता था।