सन् 1964 की बात है। जनवरी-फरवरी के दौरान मद्रास में हिन्दी के विरोध में व्यापक हिंसक घटनायें हो रही थी । पं. दीनदयाल उपाध्याय जी उन इलाकों का दौरा करने के बाद लौटे। बम्बई (मुंबई) में उनकी प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। उस प्रेस वार्ता में पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने कहा कि देश की अखंडता सबसे बड़ी जरूरत एवं आवश्यकता है । देश को गृह युद्ध का खतरा उठाकर भी भाषायी दंगों को दबा देना चाहिये । इस जवाब को सुनकर एक मराठी पत्रकार जो संभवतः ईसाई थे तथा अंग्रेजी समर्थक थे। उन्होंने कहा कि "पंडित जी यह आप क्या कह रहे हैं ? आप देश को गृह युद्ध का परामर्श दे रहे हैं।
क्या आपके वक्तव्य को छाप दिया जाये ? तो पंडित दीनदयाल जी ने निर्भिकता से कहा कि हॉमैने जैसा कहा, आप वैसा ज्यों का त्यों छाप दीजिये क्योंकि "देश की अखंडता, देश की एकता, ज्यादा महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। इसे बचाने के लिये गृहयुद्ध का खतरा भी उठाना पडे तो उठाना चाहिये । परंतु भाषायी दंगे, उपद्रवों को कठोरता से खत्म कर देना चाहिये। महोदय, आप मेरा वक्तव्य समाचार पत्र में छाप सकते हैं ? ऐसे थे पं. दीनदयाल जी ।
मैने इस विषय की 500 पुस्तकें पढ़ी हैं ?
पं. दीनदयाल जी अत्यन्त मेधावी थे तथा अध्ययन में व्यापक रूचि थीं वे सामान्यतः तृतीय श्रेणी तथा पैसेंजर में सफर करते थें ताकि लिखने-पढने का ज्यादा से ज्यादा समय मिल सकें एक बार उन्होंने पंचवर्षीय योजना पर पुस्तक लिखने का विचार किया तो उन्होंने प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) से परामर्श किया। तब रज्जू भइया ने प्रतिप्रश्न किया एवं कहा कि आप तो अर्थशास्त्र के छात्र नहीं रहे फिर कैसे लिखेंगे ? पं. दीनदयाल जी का जवाब सुनकर रज्जू भइया चकित रह गये । उन्होंने कहा कि पं. दीनदयाल जी ने बतलाया कि इस विषय पर लिखने के पूर्व उन्होंने अर्थशास्त्र से संबंधित छोटी बडी सभी उच्चकोटि की लगभग 500 पुस्तकों का अध्ययन किया है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि वे बिना अध्ययन के किसी भी विषय पर न तो बोलते थे, न लिखते थें वर्तमान में तो कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो विषय पर अधिकार न होते हुये भी बोलते हैं अध्ययन तो दूर की बात है । वे स्वयं पीछे पीछे चलेंगे...... ?
दूसरे आम चुनाव 1957 के बाद पं. दीनदयाल जी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे तथा एक कार्यकर्ता ने प्रश्न किया कि मुसलिम समाज को कैसे जनसंघ की ओर आकर्षित किया जावे? तब पं. दीनदयाल जी ने कहा कि यह वर्ग हमेशा सत्ता के पीछे चलता है। अभी कांग्रेस सत्ता में है तो कांग्रेस के साथ है। यदि आप शक्ति में वृद्धि करेंगे तो यह आपके साथ आ जायेगा। अतः आप शक्ति को प्राप्त कीजिये। बाकी काम स्वतः हल हो जायेंगे । पुनः एक कार्यकर्ता ने कहा पंडित जी एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। यदि हिन्दु - मुसलमान मिल जायेंगे तो ग्यारह हो जायेंगे। हमें ऐसा प्रयास करना चाहिये। तब पंडितजी ने कहा कि एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं लेकिन एक और आधा मिलकर ग्यारह हो सकते हैं ? एक और चौथाई मिलकर ग्याहर हो सकते हैं ? कदापी नहीं। उन्होंने कहा कि जिस दिन हिन्दू समाज संगठित हो जायेगा वे स्वयं आपसे मिलकर ग्यारह कर देंगे। आप शक्ति का संग्रह करो, शेष स्वयं हो जायेगा ।
पाले पोसे सकल अंग, तुलसी सहित .....?
पं. दीनदयाल जी का व्यक्तित्व अत्यन्त विराट एवं सरल था जो जनसंघ का प्रत्येक कार्यकर्ता महसूस करता था। वे वास्तव में परिवार के मुखिया के रूप में सभी से स्नेह रखते थे तथा ध्यान भी देते थें एक बार पं. अटल बिहारी बाजपेयी पंजाब के प्रवास से लौटे तथा दिल्ली कार्यालय पहुँच कर घोषणा की कि वे अब प्रवास पर नहीं जायेंगे। शायद प्रवास में कष्ट हुआ होगा अथवा कार्यकर्ताओं ने परेशान किया होगा। सभी पदाधिकारी स्तब्ध ? सभी सोच रहे थे कि अब पंडित जी क्या करेंगे। शायद उन्हें डांटे ? परंतु दीनदयाल जी ने सरलता से कहा अच्छा भाई आप दौरे मत करना, आप प्रवास से आये हैं आप थके हैं आप स्नान इत्यादि कीजिये, इसके बाद आराम पं. अटल जी स्नान कर लौटे तो पं. दीनदयाल जी ने रोटी सब्जी स्वयं बना दी एवं स्वयं बैठकर भोजन कराया। परिणामस्वरूप अटलजी ने मुस्कराते हुये कहा वे प्रवास करेंगे। ऐसे थे पं. दीनदयाल जी ऐसे अनेकानेक उदाहरण हैं जो पंडित दीनदयाल जी को श्रेष्ठतम बनाते थें वे रामायण की पंक्तियों को सार्थकता प्रदान करते थे कि "मुखिया मुख सो चाहिये, खान पान को एक ..........?
जन्म एवं शिक्षा .......?
पं. दीनदयाल जी का जन्म 25 सितम्बर 1916 को वर्तमान उत्तरप्रदेश की पवित्र भूमि मथुरा में नगला चन्द्रभान में हुआ था । एक ज्योतिषि ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक भविष्य में अग्रणी राजनेता एवं विचारक होगा जो आजीवन अविवाहित रहेगा। 1934 में उनके भाई के निधन ने उन्हें गहरा आघात दिया था । उन्होंने हाई स्कूल की शिक्षा सीकर राजस्थान से प्राप्त की । विद्याध्ययन में उत्कृष्ट होने के कारण उन्हें तत्कालीन सीकर नरेश ने स्वर्ण पदक एवं किताबों के लिये 250 रूपये तथा 10 रूपये मासिक छात्रवृत्ति थी । उन्होंने इंटरमीडिएट पलानी से तथा बी.ए. की शिक्षा कानपुर से की। सन् 1937 में अपने मित्र श्री बलवंत शिंदे की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गये। यहाँ इनकी मुलाकात श्री सुन्दर सिंह भंडारी जी से हुई। उन्होंने बी. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में तथा एम. ए. की पढाई के लिये आगरा आ गये । लेकिन इन्हें पुनः आघात लगा तथा इनकी बहन रमादेवी जी का निधन हो गया।
जनसंघ की स्थापना के बाद डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पं. दीनदयाल जी महासचिव बने तथा 1967 में कालीकट अधिवेशन में इन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष कादायित्व दिया गया तथा वहाँ इन्होंने "एकात्म मानव दर्शन" का विचार दिया जो आज विश्व का सर्वोत्तम विचार माना जाता है। उन्होंने चरैवेति एवं अन्त्योदय जैसी अवधारणाओं का प्रतिवादन किया। उन्होंने संस्कृति निष्ठा को परिभाषित करते हुये कहा कि“भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व का भाव रखने वाला मानव समूह एक जन है । उसकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है । इसलिये भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यही संस्कृति है। इस हमारी संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।"
जनसंघ ने ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की ?
21 अक्टूबर 1951 को जनसंघ की स्थापना के बाद राजनीति दल के रूप में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी एवं पं. दीनदयाल जी के नेतृत्व में जनसंघ ने निरंतर ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की। जनसंघ ने राष्ट्रीय एकात्मता पर विशेष ध्यान दिया। इसी क्रम में काश्मीर आंदोलन, गोवा आंदोलन, कच्छ आंदोलन प्रमुख थे। डॉ. मुखर्जी की 1953 में काश्मीर में हत्या के बाद भी जनसंघ का प्रवाह अवरूद्ध नहीं हुआ तथा निरंतर जनता में लोकप्रियता राजनीतिक सफलता मिलती गई। 1952 में 3.1 प्रतिशत वोट 3 सीटें, 1957 में 5.9 प्रतिशत वोट 4 सीटें, 1962 में 6.4 प्रतिशत वोट 14 सीटें, 1967 में 9.4 प्रतिशत वोट 35 सीटें तथा 1971 में 7.37 प्रतिशत वोट एवं 22 सीटें हासिल कीं। इस सफलता ने जनसंघ के प्रति अन्य विपक्षी दलो में घृणा का भाव मुदित हुआ। 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय लखनऊ में पं. दीनदयाल जी की हत्या इसी विचार को समाप्त करने का षडयंत्र था।
एकात्म मानव दर्शन की अवधारणा
पं. दीनदयाल जी ने जनसंघ समेत देश तथा विश्व को महत्वपूर्ण विचार दर्शन दिया जो एकात्म मानव दर्शन के रूप में जाना जाता हैं उन्होंने पूंजीवादी एवं समाजवादी विचारधाराओं को अधूरा माना तथा कहा कि इससे विश्व एवं मानवजाती का कल्याण संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि एकात्म मानव दर्शन की श्रेष्ठतम दर्शन एवं व्यापकता से सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति एवं समाज, व्यक्ति एवं प्रकृति में कोई संघर्ष नहीं बल्कि समन्वय हैं उन्होंने कहा कि संघर्ष, विनाश का तथा समन्वय विकास का आधार है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, प्रकृति, पर्यावरण एवं परमेश्वर में एकात्म भाव है। उन्होंने व्यक्ति के सुखों को शरीर सुख, मनसुख, बुद्धि सुख, आत्म सुख में बांटा एवं कहा कि व्यक्ति के सभी सुखों का एकात्मभाव से अध्ययन होना चाहिये। उन्होंने पुरुषार्थ को काम पुरुषार्थ, अर्थ पुरूषार्थ, धर्म पुरूषार्थ एवं मोक्ष पुरूषार्थ में स्पष्ट करते हुये कहा कि परम सत्ता ईश्वर को प्राप्त करने के लिये कर्म मार्ग, ज्ञान मार्ग एवं भक्ति मार्ग अपनाया जाता हैं। उन्होंने कृषि समेत, उद्योग, पूंजी निर्माण, छोटे एवं कुटीर उद्योगों समेत छोटी सिंचाई योजनाओं, उर्वरकों, पशुधन, अवमूल्यन जैसे विषयों पर तथा विदेशी नीति पर व्यापक सारगर्वित विचार रखे।
एकात्म मानवदर्शन मात्र व्यक्ति एवं समाज, राष्ट्र नहीं अपितु पशु पक्षी, जीव जंतु, नदियों, पहाड़ों परमेश्वर की भी व्याख्या करता है। जो हमारे ऋषि मुनियों ने व्याख्या की थी। उसे पं. दीनदयाल जी ने एकात्म मानव दर्शन में व्यक्त किया। वे व्यक्तिगत सोच के व्यक्ति नहीं थे, वे समग्र एवं समष्टि के विचार को महत्वपूर्ण मानते थें यही कारण है कि उन्होंने अपने दर्शन का नाम स्वयं के नाम पर न रखते हुये एकात्म मानवदर्शन नाम दिया।
राजनीति में सत्ता हमारे लिये साधन.....?
पं. दीनदयाल जी ने स्पष्टता से कहा कि सत्ता प्राप्त करना हमारे लिये मात्र साधन है। हमारा साध्य समाज में व्यापक परिवर्तन एवं मानव सेवा है। व्यक्ति, परिवार, समाज धर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारे लिये राष्ट्रधर्म है। हमारी पंच निष्ठाओं में राष्ट्रीय एकात्मता दर्शन राष्ट्रधर्म सबसे प्रमुख है। भारतीय जनता पाटी का ध्येय समाज- देश सेवा – जनसंघ से लेकर भा.ज.पार्टी तक हमारा मूल ध्येयभाव समाज सेवा एवं राष्ट्र सेवा है। पं. अटल बिहारी जब देश के प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने परमाणु परीक्षण समेत, कश्मीर में चुनाव, किसानों पर बजट की 60 प्रतिशत से ज्यादा खर्च, अधोसंरचना का विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान कर गठबंधन की सरकार को चलाकर देश को संदेश दिया कि समन्वय से भी व्यवस्थायें संचालित होती है। 2014 से माननीय नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अनेक महत्वपूर्ण योजनाओं यथा - जनधन योजना, सौभाग्य योजना, उज्ज्वला योजना, मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, किसान सम्मान निधि, स्टार्ट अप, मेक इन इंडिया समेत ऐतिहासिक निर्णय लिये इसमें धारा ३७० ॉकी समाप्ति, नागरिकता संशोधन कानून, तीन तलाक की समाप्ति, श्रम कानून (संशोधन), न्यायालय के माध्यम से रामजन्मभूमि का शांतिपूर्ण समाधान, सर्जिकल स्ट्राइक, विदेशी नीति की सफलता ऐसे विषय हैं जो मील का पत्थर बन गये हैं। पं. दीनदयाल जी के चरैवेति एवं अन्त्योदय के विषय को आत्मसात कर भारतीय जनता पाटी अपने सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य पर सतत् चल रही है।
आज 11 फरवरीको पं. दीनदयाल उपाध्याय की पुण्य तिथि पर हम उनके प्रति नतमस्तक हैं उन्होंने विचार एवं विचार तारा का जो मंत्र दिया, वह हमारी शक्ति एवं साहस है। आइये संकल्प लें कि हम उस महामानव, अजातशत्रु के मार्गों का अनुसरण हमेशा करते रहेंगे।
(लेखक - डॉ. विनोद मिश्रा कुलगुरू रानी अवंती बाई लोधी विश्वविद्यालय सागर (म. प्र. )