लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक के लोकसभा में पेश होते ही विपक्षी दलों की ओर से काव-कांव शुरू हो गई है। एक ओर विपक्ष कह रहा है कि उसे महिलाओं को आरक्षण देने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन इस सहमति के बाद भी वह इसका विरोध कर रही है। आखिर विपक्ष चाहता क्या है, यह समझ से परे है? विपक्ष परिसीमन की आड़ लेकर इस विधेयक को रोकना चाहता है।
विपक्ष की मंशा यह है कि किसी न किसी तरह से इस विधेयक को पारित नहीं होने दिया जाए। इसके लिए वह तरह तरह के झूठ व भ्रम फैलाकर देश की जनता को बरगलाने में लगी हुई है। दरअसल विपक्ष को खासतौर पर कांग्रेस को इस बात का डर है कि कहीं उसका वोटबैंक बिखर न जाए। हालांकि विपक्ष के आरोपों को देखें तो भाजपा ऐसा कुछ कर भी नहीं रही बल्कि वो प्रस्तावित बिल पारदशीं नीति और व्यापक चर्चा के बाद डेलिमिटेशन चाहती है, लेकिन कांग्रेस को डर है कि इससे उसका वोट बैंक टूट सकता है।
लेकिन आम जनता जानती है कि लोकतंत्र में हर वोट बराबर होना चाहिए। कोई समुदाय वीटो नहीं चला सकता। अगर सीटें आबादी के हिसाब से बंटेगी तो मुस्लिम बहुल गेट्टझे टूटेंगे, हिंदू परिवार सुरक्षित रहेंगे, तुष्टिकरण बंद होगा और विकास सबके लिए होगा। विपक्ष का आरोप यह सिर्फ राजनीतिक चाल है। जबकि हकीकत यह है कि भारत को निष्पक्ष डेलिमिटेशन की जरूरत है। इससे सड़क पर शाति आएगी. चुनाव में सच्चा प्रतिनिधित्व होगा और लोकतंत्र मजबूत बनेगा। भाजपा अगर यह करती है तो यह देश की भलाई के लिए करेगी। आम आदमी तो यही चाहता है। जिसमें न कोई वीटो हो, न कोई तुष्टिकरण हो, अगर कुछ हो तो वो है समान न्याय। इस विधेयक की चर्चा के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री ने इस बात को लेकर विपक्ष को आश्वस्त किया है कि यदि उन्हें इसका क्रेडिट लेना है तो वह इसके लिए तैयार है, लेकिन विधेयक को पारित होने में पूरा सहयोग दें।
2023 में जब यह विधेयक पारित हुआ था, तब विपक्षी दलों की मांग थी कि आखिर महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से क्यों नहीं लागू किया जाता, लेकिन अब जब मोदी सरकार इस अगले आम चुनाव में लागू करने की पहल कर रही है तो भी उन्हें आयत्ति है। अब वे यह कह रहे हैं कि महिला आरक्षण से संबंचित परिसीमन को 2011 के बजाय नई जनगणना के आधार पर किया जाए। इसका मतलब है कि वे 2029 के बजाय 2034 में महिला आरक्षण लागू करने के पक्ष में हैं, क्योंकि जो जनगणना शुरू हुई है, उसके नतीजे आते-आते तो अगले आम चुनाव करीब आ जाएंगे। कुछ विपक्षी दल इस आधार पर महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं कि इसमें आरक्षण के अंदर आरक्षण होना चाहिए। आखिर ऐसी किसी मांग पर 2023 में क्यों नहीं जोर दिया गया था? ध्यान रहे तब महिला आरक्षण विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ था।
विपक्षी दल यह प्रचारित करने की भी कोशिश में हैं कि महिला आरक्षण के तहत सभी राज्यों में लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने के फार्मूले से कुछ राज्यों और विशेष रूप से दक्षिण के राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान होगा, लेकिन आखिर कैसे? यदि इस फार्मूले से बिहार में 20 सीटें बढ़ेंगी तो इतनी ही सीटें तमिलनाडु में भी बढ़ेंगी। इसी तरह गुजरात, आंध्रप्रदेश और राजस्थान में 13-13 सीटें बढ़ेगी। तथ्य यह भी है कि कम जनसंख्या वाले दक्षिण के राज्यों में एक सासद कहीं कम आबादी का प्रतिनिधित्व करेगा और इस तरह वह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा। आखिर ऐसे में यह कहने का क्या मतलब महिला आरक्षण से दक्षिण घाटे में और उत्तर भारत लाभ में रहेगा? विपक्ष का एक खोखला तर्क यह भी है कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप से भाजपा फायदे में रहेगी, पर इसका भी कोई ठोस आधार नहीं दिखता।