जेनेरिक दवाएं खाने से अधिकांश मरीज हिचकते हैं। उन्हें लगता है कि ब्रांडेड न होने के कारण ये दवाएं खास असर नहीं करती हैं। जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में बहुत ही कम मूल्य अर्थात सस्ती होने के कारण आशंका और बढ़ जाती है कि कहीं बीमारी ठीक होने में काफी समय न लग जाए। इन सब भ्रांतियों को दूर करने के लिए भारत सरकार और कई एनजीओ ने रिसर्च के आधार पर स्पष्ट किया है कि शंका करने की जरूरत नहीं है। ब्रांडेड दवा और जेनेरिक दवा में कोई फर्क नहीं है। मालूम हो कि भारत जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, जो विश्वभर के बाजारों में सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध कराता है। साथ ही, ब्रांडेड दवाओं के समान ही प्रभावकारिता, सुरक्षा और गुणवत्ता बनाए रखता है।
जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं के किफायती संस्करण हैं, जिन्हें दवा निर्माता द्वारा प्राप्त पेटेंट समाप्त होने के बाद उत्पादित किया जाता है। जब एक नई दवा का निर्माण किया जाता है, तो दवा के मूल निर्माता को पहले कुछ वर्षों के लिए पेटेंट के तहत संरक्षित किया जाता है। पेटेंट की वैधता के दौरान, मूल निर्माता दवा का एकमात्र उत्पादक और विक्रेता होता है और विनियमों के भीतर वह दवा की कीमत तय करता है। पेटेंट समाप्त होने के बाद, अन्य फार्मा निर्माता दवा का उत्पादन और विपणन करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन उनके उत्पादों में मूल दवा के समान सामग्री होनी चाहिए। इन्हें जेनेरिक दवाओं के रूप में जाना जाता है। जेनेरिक दवाओं की कीमतें मूल दवाओं की तुलना में सस्ती हैं, क्योंकि निर्माताओं ने अनुसंधान या परीक्षण की लागत नहीं उठाई होती है।
जेनेरिक दवाएं समान रूप से प्रभावी और सस्ती हैं, फिर हर कोई उन्हें क्यों नहीं खरीदता? 2019 में जर्नल ऑफ ड्रग डिलीवरी एंड थेरेप्यूटिक्स द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि 62 फीसदी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता जेनेरिक दवाओं की प्रभावकारिता के बारे में शंका करते हैं। चिकित्सकों ने भी जेनेरिक दवाओं के प्रति संदेह और विश्वास की कमी व्यक्त की है। सर्वेक्षण में शामिल 92 फीसदी लोग जेनेरिक दवाओं के बारे में जानते थे; इनमें से केवल 70 फीसदी ही जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच के अंतर को समझ पाए। इसलिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा परिषद ने अनिवार्य किया है कि सभी डॉक्टर अपने पर्चे में स्पष्ट रूप से उल्लिखित जेनेरिक नामों वाली दवाएं लिखें। क्योंकि ये दवाएं उतनी ही सुरक्षित और उतनी ही प्रभावी होती हैं जितनी कि ब्रांडेड दवाएं, और ये काफी बचत करने का एक किफायती तरीका हैं।
अमेरिका में दी जाने वाली दवाओं में से लगभग 90 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं होती हैं, लेकिन कुल दवा लागत में इनका हिस्सा केवल 12 प्रतिशत है। आज उपलब्ध हजारों जेनेरिक दवाओं का एफडीए द्वारा कड़ाई से परीक्षण किया जाता है और उन्हें यह साबित करना होता है कि वे ब्रांडेड दवाओं के समान ही हैं, जिनमें सक्रिय तत्व, क्षमता और खुराक समान हैं। ऑस्ट्रेलिया में जेनेरिक दवाएं तभी बेची जा सकती हैं, जब वे मूल ब्रांड के समान सख्त मानकों को पूरा करती हैं।
अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (एएमए), जो उन कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में रोगियों के लिए उपलब्ध एफडीए-अनुमोदित अधिकांश जेनेरिक दवाओं का निर्माण करती हैं, ने भी सुनिश्चित किया है कि वे ब्रांड नाम वाली दवाओं के जैव-समतुल्य हैं।
अमेरिकी ट्रेडमार्क कानूनों के अनुसार, जेनेरिक दवाओं को ब्रांडेड दवा के समान दिखने की अनुमति नहीं होती है। जेनेरिक दवाएं रंग और स्वाद आदि के मामले में ब्रांडेड दवाओं से भिन्न हो सकती हैं और एफडीए यह सुनिश्चित करता है कि इनसे दवा के कार्य करने के तरीके पर कोई प्रभाव न पड़े। ध्यान दें कि जेनेरिक दवा में ब्रांडेड दवा के समान सक्रिय तत्व होने चाहिए। किस ब्रांडेड दवा का जेनेरिक वर्जन उपलब्ध है या नहीं, इसकी जानकारी चिकित्सक या फार्मासिस्ट ही दे सकते हैं। ब्रांडेड दवाओं के नाम जेनेरिक दवाओं के नामों से भिन्न भी होते हैं, क्योंकि कई जेनेरिक नाम दवा के रासायनिक नाम, संरचना या फार्मूला के संक्षिप्त रूप होते हैं। ब्रांड नाम कंपनी द्वारा बनाया जाता है और आमतौर पर छोटा और याद रखने में आसान होता है।
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 और उसके तहत बनाए गए नियमों में 'जेनेरिक दवाओं' की कोई परिभाषा नहीं है और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को कुछ जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता, चिकित्सीय प्रभावशीलता एवं असर शुरू होने के समय में भिन्नता के संबंध में ऐसी कोई रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।
देश में दवाओं का निर्माण, बिक्री और वितरण मुख्य रूप से औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम एवं नियम, 1945 के प्रावधानों के तहत विनियमित होता है। यह विनियमन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों द्वारा लाइसेंस और निरीक्षण प्रणाली के जरिए किया जाता है। लाइसेंस धारक को औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन नियम, 1945 के तहत निर्धारित लाइसेंस की सभी शर्तों का पालन करना आवश्यक है। लाइसेंस की एक शर्त के अनुसार, लाइसेंस धारक को अपने उत्पाद के निर्माण में उपयोग किए गए कच्चे माल के प्रत्येक बैच या लॉट और साथ ही अंतिम उत्पाद के प्रत्येक बैच का परीक्षण करना आवश्यक है और ऐसे परीक्षणों से संबंधित विवरण दर्शाने वाले अभिलेख या रजिस्टर रखना आवश्यक है। इसके अलावा, देश में निर्मित दवाओं को, चाहे वे जेनेरिक दवाएं हों या ब्रांडेड दवाएं, या घरेलू या अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए हों, गुणवत्ता के लिए औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 और उसके तहत बनाए गए नियमों में निर्धारित मानकों का पालन करना आवश्यक है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने संसद में जानकारी दी है कि विषय विशेषज्ञ समिति (एसईसी) के विशेषज्ञों के परामर्श से सीडीएससीओ गुणवत्ता, सुरक्षा एवं प्रभावकारिता के व्यापक मूल्यांकन के आधार पर नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण (एनडीसीटी) नियम, 2019 के प्रावधानों के अनुसार नई दवाओं को मंजूरी देता है।

एस. एन. वर्मा
(लेखक, स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं)