एसआईआर: मतदाता सूची शुद्धिकरण क्यों जरूरी

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) – क्यों?

लेख में एसआईआर को संवैधानिक प्रक्रिया बताते हुए मृतकों, स्थानांतरित मतदाताओं और दोहरे नामों को हटाने की जरूरत बताई गई है। लेखक ने विपक्ष के विरोध और अवैध प्रवासन पर सवाल उठाए हैं।

By : नरेंद्र कुमार
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) – क्यों?

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित ‘हम भारत के लोग’ अपने संविधान को आत्मार्पित करते हैं। भारत में जन्मे, भारत की एकता और अखंडता के प्रति निष्ठा रखने वाले तथा भारतीय संविधान में आस्था रखने वाले नागरिकों से ही ‘हम भारत के लोग’ का तात्पर्य है। चुनाव, प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकार और कानून का शासन लोकतंत्र के आधार हैं। भारत के प्रति समर्पित वयस्क नागरिकों को ही भारत में सरकारें चुनने का अधिकार है। चुनाव के माध्यम से भारत में राज्य और केंद्र की सरकार चुनने का अधिकार विदेशी घुसपैठियों को देना कैसे संभव हो सकता है? इसी कारण संविधान में मतदाता सूची के शुद्धिकरण की व्यवस्था है।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करने का अधिकार चुनाव आयोग को प्राप्त है। अब तक 13 बार मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्य किया जा चुका है। यह प्रक्रिया 1952-56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983-84, 1987-89, 1992, 1993, 1995, 2002, 2003 और 2004 में हुई है। वर्ष 2025 में बिहार प्रदेश से प्रारंभ हुआ यह 14वाँ विशेष गहन पुनरीक्षण है। वर्ष 2004 के बाद 22 वर्षों के दौरान यह प्रक्रिया पहले ही पूर्ण हो जानी चाहिए थी, जो नहीं हुई। वर्तमान में एसआईआर का विरोध करने वाले दलों की केंद्र एवं राज्यों में सरकारें रहते हुए भी अनेक बार मतदाता सूची के शुद्धिकरण की यह प्रक्रिया हुई है।

संविधान का अनुच्छेद 326 मताधिकार को केवल भारत के नागरिकों तक सीमित करता है, जबकि अनुच्छेद 324 निर्वाचक नामावली की तैयारी तथा उसकी शुद्धता का दायित्व निर्वाचन आयोग को सौंपता है। अनुच्छेद 325 भी निर्वाचक नामावली से संबंधित व्यवस्था करता है। इन प्रावधानों का उद्देश्य प्रत्येक वैध भारतीय नागरिक को मतदान का अधिकार देना, एक मतदाता का नाम एक ही स्थान पर सुनिश्चित करना और अवैध अथवा अनैतिक पद्धति से प्रवेश करने वाले लोगों को भारत की सरकार चुनने के अधिकार से वंचित रखना है।

आजीविका के उद्देश्य से अनेक नागरिक अपने स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते हैं। इसके कारण पूर्व स्थान की मतदाता सूची में नाम रहने के बावजूद वे दूसरे स्थान पर भी अपना नाम दर्ज करा लेते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि लगभग 45 करोड़ लोगों ने देश के भीतर ही आंतरिक प्रवास किया। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार, 2001 से 2011 के मध्य प्रतिवर्ष औसतन 50 से 65 लाख लोगों ने स्थान परिवर्तन किया। विशेष गहन पुनरीक्षण के अंतर्गत बिहार प्रदेश में 7.01 लाख नाम दो स्थानों की मतदाता सूचियों में दर्ज पाए गए। यह स्थिति देश के अन्य राज्यों में भी है।

देश के कुल मतदाताओं में गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया होने के उपरांत 13.30 करोड़ में से लगभग 2 करोड़ 80 लाख मृतकों के नाम मतदाता सूची में पाए गए। 6.30 करोड़ लोगों ने अपना स्थान परिवर्तन कर दूसरे स्थान पर मतदाता सूची में नाम जुड़वा लिया था। 3 करोड़ मतदाताओं के बारे में जानकारी ही नहीं मिली। 1.02 लाख मतदाताओं के नाम दो बार मतदाता सूची में दर्ज थे। ये आँकड़े मतदाता सूची के शुद्धिकरण की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं।

सेना के अवकाश प्राप्त जनरल एस.के. सिन्हा ने असम के राज्यपाल रहते हुए 8 नवंबर 1998 को राष्ट्रपति को ‘असम में अवैध प्रवासन पर प्रतिवेदन’ के माध्यम से घुसपैठ के खतरे के संबंध में सचेत किया था। उनके अनुमान के अनुसार, केवल असम में ही 60 लाख घुसपैठिए थे। उन्होंने घुसपैठ एवं उग्रवाद के परस्पर संबंध तथा सीमा पर जनसांख्यिकीय परिवर्तन का वर्णन करते हुए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था। वर्ष 2016 में गृह राज्य मंत्री रहते हुए श्री किरण रिजिजू ने संसद में जानकारी दी थी कि लगभग 2 करोड़ से अधिक घुसपैठिए भारत में रह रहे हैं। कुछ अनुमान इस संख्या को 3 करोड़ तक बताते हैं।

पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा की विजय के पश्चात बांग्लादेशी घुसपैठियों ने स्वतः ही बांग्लादेश की ओर पलायन किया था। उत्तर 24 परगना के हकीमपुर सीमा क्षेत्र की ओर जाते हुए इन घुसपैठियों ने समाचार माध्यमों के सामने स्वीकार किया था कि उनके बिचौलियों एवं सत्तालोलुप नेताओं द्वारा अवैध मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, स्थायी खाता संख्या एवं राशन कार्ड बनवाए गए थे। कलकत्ता एवं गुवाहाटी उच्च न्यायालयों में भी यह तथ्य सामने आ चुके हैं।

रोजगार के लिए प्रवास करने वाले मतदाता किसी भी राजनीतिक दल को अपना मत देने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन मृतक मत नहीं दे सकते और विदेशी नागरिकों को भारत की सरकार चुनने का अधिकार नहीं हो सकता। विपक्ष द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध अवैध घुसपैठियों के समर्थन के लिए ही है, ऐसा लगता है। क्योंकि यही उनके थोक मतदाता थे। क्या इनके बल पर ही वे चुनाव जीतते थे? इस प्रश्न का उत्तर विपक्षी दलों को देश को देना चाहिए।

चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण के समय एक संवैधानिक एवं व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जाती है। प्रदेश स्तर से लेकर मतदान केंद्र स्तर तक सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति होती है। इसी प्रकार, राजनीतिक दलों से भी अपेक्षा रहती है कि वे विधानसभा स्तर से लेकर मतदान केंद्र तक अपने बूथ स्तरीय अभिकर्ता-1 एवं अभिकर्ता-2 नियुक्त कर इस प्रक्रिया में सहयोग करें और लोकतंत्र को मजबूत बनाएं। प्रपत्र 6, 7 और 8 का उपयोग करते हुए मतदाता सूची के शुद्धिकरण का प्रयास करें तथा गलत नाम जुड़ने एवं कटने पर आपत्ति व्यक्त करें।

लेकिन कमजोर राजनीतिक दल सभी मतदान केंद्रों पर अपने बूथ स्तरीय अभिकर्ता नियुक्त कर पाने में असमर्थ रहते हैं। अपनी कमजोरी छिपाने के लिए वे मत चोरी का आरोप लगाते हैं। कांग्रेस बिहार प्रदेश के 77,895 मतदान केंद्रों में से केवल 17,000 और बंगाल के 85,379 मतदान केंद्रों में से केवल 5,797 पर ही अपने बूथ अभिकर्ता नियुक्त कर पाई थी। निर्वाचन आयोग के अनुसार, कांग्रेस ने मतदाता सूची के संदर्भ में एक भी आपत्ति नहीं की। जिन राज्यों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी, वहाँ भी विपक्षी विधायक जीते हैं। वहीं, हिमाचल, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु जैसे प्रदेशों में कांग्रेस अथवा विपक्षी दलों की सरकारें भी बनी हैं। कांग्रेस के अनेक नेताओं ने एसआईआर की प्रशंसा भी की है। तब संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को आरोपित करना लोकतंत्र के प्रति जघन्य अपराध है।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1952 में प्रथम चुनाव के बाद मतदाता सूची के शुद्धिकरण की आवश्यकता को लेकर 12 फरवरी को पत्र लिखकर सचेत किया था कि ‘सबसे पहले मतदाता सूची का शुद्धिकरण किया जाए।’ केरल के नेता श्री रमेश चेन्नीथला ने आयोग को 4 लाख अवैध मतदाताओं की सूची देते समय कहा था कि भौतिक सत्यापन एवं मतदाता सूची के गहन शुद्धिकरण के बिना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। केरल में कांग्रेस अपनी विजय का श्रेय भी मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया को ही देती है।

केवल अपने देश में ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, स्वीडन, केन्या और ब्राजील जैसे देश भी समय-समय पर अपनी मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण का अभियान चलाते हैं। ब्रिटेन में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को प्रतिवर्ष स्वयं पंजीकरण करवाना अनिवार्य है।

अराष्ट्रीय शक्तियों द्वारा भारत को अस्थिर करने के अनेक प्रकार के प्रयास हम पिछले दिनों से देख ही रहे हैं। किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन अधिनियम आदि के नाम पर झूठा विमर्श फैलाने के लिए प्रारंभ हुए आंदोलन अब इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्र और एसआईआर के झूठे दुष्प्रचार से होते हुए ज्ञानेश कुमार को हटाने की माँग के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को हटाने एवं सत्ता परिवर्तन तक की भाषा बोल रहे हैं। अराजकतावाद से उत्पन्न बांग्लादेश का हिंसक आंदोलन उनकी प्रेरणा है। सामाजिक माध्यमों से निर्मित झूठा विमर्श उनके हथियार और कुछ विदेशी ताकतें उनकी सहयोगी हैं। इसी को बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने अराजकतावाद कहा था।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत गरीबी से मुक्त हो रहा है। ऐसे समय में विपक्षी पार्टियाँ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के माता-पिता को भद्दी गालियाँ देकर नरेंद्र मोदी मुक्त भारत करना चाहती हैं। देश की विकासवादी एवं राष्ट्रीय शक्तियों से आह्वान है कि ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ का संकल्प लेकर देश की जनता को जागृत करें।

शिवप्रकाश

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री हैं।)

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