वोट चोरी बनाम अराजकता की सियासी जंग

'वोट चोरी' बनाम 'अराजकता' की राजनीति

वोट चोरी के आरोपों पर विपक्षी गठबंधन के आंदोलन ने राहुल गांधी का नेतृत्व मजबूत किया है। भाजपा 1984 के सिख दंगों का मुद्दा उठाकर जवाब दे रही है, जिससे संसद और आगामी चुनावों तक सियासी संघर्ष जारी रहने के आसार हैं।

By : नरेंद्र कुमार
'वोट चोरी' बनाम 'अराजकता' की राजनीति

वोट चोरी के मुद्दे पर पूरा विपक्षी गठबंधन न सिर्फ एकजुट, बल्कि बेहद आक्रामक भी नजर आ रहा है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और परिणामस्वरूप शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को तो इस बार दिल्ली पुलिस ने आंदोलन नहीं करने दिया, लेकिन विपक्ष को रोकने में उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली।

देश में राजनीतिक लड़ाई 'वोट चोरी बनाम अराजकता' के नैरेटिव तक सिमटती दिख रही है। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों ही रविवार को सड़कों पर नजर आए। वोट चोरी के मुद्दे पर विपक्ष ने मार्च निकालते हुए दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली की तो भाजपा ने उसे 1984 के सिख दंगों से जोड़ते हुए देश भर में कांग्रेस के विरुद्ध मार्च निकाला। सड़क से गरमाती इस राजनीति की तपिश इसी माह शुरू होने जा रहे संसद के शीतकालीन सत्र में भी महसूस की जाएगी। वोट चोरी बनाम अराजकता के नैरेटिव की राजनीति कम-से-कम अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों तक तो चलेगी। अगर विधानसभा चुनावों में इसका असर दिखा तो 2029 के लोकसभा चुनावों तक भी यह राजनीति खिंच सकती है।

हालांकि, दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली समेत आयोग की कार्यप्रणाली पर 10 महीनों में 14 बार आपत्ति जताने के मीडिया में हुए खुलासे के बाद यह विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है, जहां अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। जाहिर है, अदालती लड़ाई लंबी चलती है, लेकिन विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' द्वारा 31 अक्टूबर को मॉक पार्लियामेंट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग पारित करने के अगले ही दिन रामलीला मैदान की रैली में दिखे तेवरों से साफ है कि विपक्ष इस मुद्दे को हाथ से नहीं जाने देगा और सड़क पर भी लड़ाई जारी रखेगा।

जवाब में भाजपा बेहद आक्रामक नजर आ रही है, लेकिन उसकी प्रतिक्रियाओं को इस मुद्दे पर उसके दबाव में होने के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। मॉक पार्लियामेंट का मखौल उड़ाने वाली भाजपा ने एक नवंबर को 'इंडिया' गठबंधन की रैली को सिख दंगा पीड़ितों के जख्मों पर नमक बताते हुए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने के लिए देश भर में मार्च निकाले। दिल्ली के सिख बहुल इलाकों में इस मार्च का नेतृत्व सिख समुदाय से आने वाले इकलौते केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने किया तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने मार्च के लिए हरियाणा के रोहतक को चुना। हर मार्च में हर नेता के निशाने पर कांग्रेस ही रही।

ध्यान रहे कि 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्हीं के सिख सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या कर दिए जाने के बाद मुख्य रूप से एक नवंबर से भड़के सिख विरोधी दंगों में देश भर में हजारों सिखों की हत्या कर दी गई थी। राजधानी दिल्ली में ही एक हजार से ज्यादा सिख मारे गए थे। दिल्ली के कई बड़े कांग्रेसी नेताओं पर सिख विरोधी दंगों में संलिप्तता के आरोप लगे। सज्जन कुमार को तो सजा भी हुई, जिनकी पिछले दिनों ही जेल में मृत्यु हो गई। इसमें दो राय नहीं कि सिख दंगे एक दुखद और शर्मनाक घटनाक्रम रहे, पर क्या 1984 के बाद पंजाब में कई बार कांग्रेस की सरकार बनना यह नहीं बताता कि सिख समुदाय कांग्रेस को अपने दुश्मन के रूप में नहीं देखता? दिल्ली में भी लगातार तीन बार कांग्रेस की सरकार बिना सिख समुदाय के समर्थन के नहीं बन सकती थी। सिख दंगों के लिए मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए माफी मांगी थी तो खुद राहुल गांधी भी माफी मांग चुके हैं। बेशक, सिख दंगों के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए भाजपा और उसकी सरकार प्रयासरत दिखीं, लेकिन भाजपा ने एक नवंबर की रैली को सिख दंगों के मुद्दे पर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने का मौका शायद इसलिए भी बनाया, क्योंकि पंजाब में अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव हैं।

भाजपा ने कांग्रेस को धनतेरस और दीपावली जैसे त्योहारों के मद्देनजर भी कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उसका कहना था कि इससे खासकर रामलीला मैदान के नजदीकी चांदनी चौक और सदर बाजार जैसे बड़े बाजारों के दुकानदारों को हजारों करोड़ का नुकसान होगा। बेशक, व्यापारियों के संगठन सीआईटी ने भी कांग्रेस को चार-चार पत्र लिखकर रैली स्थगित करने की मांग की। कांग्रेस से हर्जाना मांगने की धमकी भी दी गई, लेकिन राहुल गांधी ने जवाब दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा दिलवा दें, 30 सेकंड में रैली रद्द कर दी जाएगी। रैली वाले दिन राहुल गांधी ने वीडियो जारी कर रैली में भाग लेने आए लोगों से अपील की कि वे वापसी में दिल्ली के व्यापारियों से खरीदारी करें, लेकिन बाद में दूसरा वीडियो जारी कर दिल्ली पुलिस पर जबरदस्ती दुकानें बंद करवाने का आरोप भी लगाया। यानी नैरेटिव बनाने की कवायद में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाह रहा।

वोट चोरी के मुद्दे पर पूरा विपक्षी गठबंधन न सिर्फ एकजुट, बल्कि बेहद आक्रामक भी नजर आ रहा है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और परिणामस्वरूप शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को तो इस बार दिल्ली पुलिस ने आंदोलन नहीं करने दिया, लेकिन विपक्ष को रोकने में उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली। चुनाव आयोग तक मार्च और फिर जंतर-मंतर पर धरना पुलिस द्वारा विफल कर दिए जाने के बाद 'इंडिया' गठबंधन सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने में सफल रहा। भाजपा ने उसे न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश बताते हुए कड़ी आलोचना की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे उस नजरिए से नहीं देखा।

जैसा कि अक्सर होता है, रामलीला मैदान की रैली में जुटी भीड़ को लेकर अपने-अपने दावे हैं। कांग्रेस के 10 लाख लोग जुटाने के दावे की याद दिलाते हुए भाजपा रैली को फ्लॉप बता रही है तो 'इंडिया' गठबंधन रैली को ऐतिहासिक बता रहा है। सच इन दोनों के बीच कहीं है। 10 लाख की भीड़ दिल्ली में आज तक किसी रैली में नहीं जुटी, लेकिन 12 साल से चुनावी हार से बेजार विपक्ष तमाम सरकारी बंदिशों के बावजूद प्रभावशाली भीड़ जुटाने में सफल रहा।

राजनीतिक रैलियों में भीड़ का अपना महत्व है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि वोट चोरी के मुद्दे पर आंदोलन ने विपक्ष को एकजुट कर दिया है और राहुल गांधी को उसके निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित किया है। 19 सदस्यीय 'इंडिया' गठबंधन के विस्तार की उम्मीदें भी जगी हैं। गठबंधन का हिस्सा न होने के बावजूद ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के बीजू जनता दल ने चुनाव आयोग तक मार्च में भाग लिया तो आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस अतीत में मोदी सरकार का समर्थन करने पर अफसोस जताते हुए अब विपक्षी गठबंधन में शामिल होना चाहती है।

रामलीला मैदान की रैली में 'इंडिया' गठबंधन के नेताओं से वोट चोरी के मुद्दे पर आंदोलन के अगले कदम की घोषणा की उम्मीद थी, पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। वैसे, संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने में तीन सप्ताह का समय शेष है, जिसमें विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करेगा ही। यानी सड़क से संसद तक सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच वोट चोरी बनाम अराजकता के राजनीतिक नैरेटिव की जंग जारी ही रहेगी, पर विवाद का केंद्र बने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का मौन टूटने के कोई संकेत नहीं मिलते।

राज कुमार सिंह

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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