वर्ष 1980 में केंद्र एवं राज्य में कांग्रेस की सरकार के दौरान अंदर ही अंदर भोपाल के आसपास के जिलों में जिस तरह से वनवासी क्षेत्र में मतांतरण मजबूती से फैलता चला गया, संभवतः ऐसी स्थितियां कई वर्षों में निर्मित नहीं हुई थी। वर्ष 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह मा .हो .वि . शेषाद्री जी ने इस गंभीर एवं संवेदनशील विषय पर भोपाल में पत्रकार वार्ता का आयोजन किया और पत्रकारों के समक्ष भोपाल के समीप जिले सिलवानी तहसील में हजारों की संख्या में होने वाले सामूहिक मतांतरण पर चिंता व्यक्त करते हुए सामाजिक आंदोलन तैयार करने के विषय में रूपरेखा पत्रकारों के समक्ष रखी। इसके बाद केंद्र एवं राज्य सरकार में हड़कंप की स्थिति पैदा हो गई।
सामूहिक नेतृत्व के साथ अपने अभियान का श्री गणेश कर दिया। तहसील सिलवानी के 25 से 30 समीप के ग्रामों के भ्रमण कार्यक्रम एवं जनजाति समाज के बंघुओ के साथ संघ के लोगों की बैठक, एवं प्रभावित गांव पटपरी, हथनापुर,नकटुआ, सलैया, मरेठी, फूलमार, सहित दो दर्जन से अधिक गांव का दौरौ के पश्चात यह सामने आया कि लगभग 5 वर्ष के अंतराल में जनजाति क्षेत्र की बालक बालिकाओं के बीच ₹10 देकर मिशनरी द्वारा बैठकों में बुलाकर, ग्रामीण स्तर तक छात्रावास में अध्ययन करने वाली बच्चियों, उनके माता-पिता के बीच मतांतरण संपूर्ण आकार ले चुका था।
यह गंभीर स्थितियों थी। इस विषय में संघ ने अपना कार्य प्रारंभ किया। रायसेन जिले के जिला बौद्धिक प्रमुख श्री राम जी सहस्त्र बुद्धे, बेगमगंज के रामकृष्ण मिशन के माध्यम से संचालित संस्कार केंद्र का पुनर्निर्माण, गंगा प्रसाद तिवारी जी के साथ पिपलिया और शाहपुर को प्रारंभिक स्थिति में चुना गया और ग्रामीण स्तर पर संस्कार केंद्र का प्रारंभ हुआ। 3 जनवरी 1984 को संघ विचारधारा से जुड़े हुए लोगों ने ग्रामीण स्तर पर बालिका शिक्षा अध्ययन ग्रामीण लोगों के बीच पहुंचकर प्रारंभ कर दिया। जिन गांवों में ईसाई मिशनरी का विद्यालय चल रहा था, वहां पर संस्कार केंद्र के माध्यम से बनवासी शिक्षा केंद्र प्रारंभ हुई।
मतांतरण से प्रारंभ बनवासी शिक्षा और विद्या भारती का प्रवेश
वर्ष 1980 में वनवासी क्षेत्र में फैले हुए मतांतरण के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संघर्ष और शिक्षा अभियान धीरे-धीरे अर्थात वर्ष 1988 -89 तक स्वयंसेवकों के माध्यम से संघ शिक्षा वर्ग करते हुए संस्कार केंद्र संख्या 11 तक जा पहुंचा। संघर्ष की अलख कुछ इस तरह से जागृत हुई कि रायसेन से प्रारंभ हुआ अभियान धीरे-धीरे मध्य भारत प्रांत में रामकृष्ण मिशन के साथ जुड़ता हुआ संपूर्ण प्रदेश में फैल गया। रायसेन जिले में नगरी विद्यालय चल रहे थे परंतु जनजाति क्षेत्र में अलग ही संघर्ष की स्थितियां थी।
1988 में ही रामकृष्ण मिशन रायसेन ने अपने विद्यालयों को विद्या भारती को सौंप दिया। माननीय सहस्त्र बुद्धि जी का बेगमगंज स्थानांतरण हुआ और 1980 में प्रांत संगठन मंत्री श्री बापू राम जी सर देसाई एवं प्रादेशिक सचिव श्री कुलकर्णी ने आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने का संकल्प लिया एवं केंद्र आचार्य को मानदेय का भुगतान करते हुए जनजाति क्षेत्र में विद्या भारती का प्रारंभ 1990 तक विधिवत प्रारंभ हो गया।
बाबड़ी के श्री गणेश और मिशनरी के खिलाफ आंदोलन
3 जनवरी, 1986 को सियारमऊ ग्राम के बाबड़ी (कुआ) नामक कुएं में ईसाई मिशनरी द्वारा खुदाई कराई जा रही थी जिसमें श्री गणेश जी की प्राचीन मूर्ति निकली जिसे उन लोगों ने वहाँ से हटवा दिया। श्री गणेश यथास्थान रहेंगे, इस बात को लेकर श्री गंगा प्रसाद जी ने विभाग प्रचारक मा. राजकुमार जी जैन के मार्गदर्शन में एक बड़ा जनआंदोलन चलाया। जिसके कारण श्री गणेश जी की मूर्ति पुनः उसी स्थान पर चबूतरा बनाकर स्थापित की।
निर्माण के समय मिशनरी के लोगों ने श्री गंगा प्रसाद जी पर गोली चलाई, जिसमें वे ईश्वर कृपा से बच गए। फिर उन्होंने विजयराम जी अहिरवार के साथ मिलकर मिशनरी के लोगों को जमकर पीटा, जिससे वे भाग खड़े हुए। पुलिस का प्रकरण बना, फिर श्री गंगाप्रसाद जी मूर्ति स्थापना को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गये, जो 56 घंटे तक चला और अनशन तब टूटा जब बरेली के स्वयंसेवक श्री राधेश्याम जी पालिवाल, श्री सुरेश जी बिदुआ आदि 20–25 लोगों ने चबूतरा बनाकर मूर्ति स्थापित की।
चबूतरा निर्माण हेतु 20,000 रुपये प्रांत से व्यवस्था की गई। वह बाबड़ी व श्री गणेश मूर्ति आज भी यथावत हैं। आज भी उपरोक्त स्थान को बावड़ी के गणेश के नाम से जाना जाता है। इस तरह के धार्मिक कार्यक्रम एवं आंदोलन के माध्यम से ईसाई मिशनरी के प्रति लोगों की आस्था को धीरे-धीरे समाप्त करने का कार्य जैसे-जैसे आगे बढ़ा उसी क्रम में विद्या भारती के कार्यक्रम सामूहिक संघ शक्ति के साथ आगे बढ़ते रहे।