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Rahul Gandhi’s Lok Sabha Allegations Trigger Epste

राहुल गांधी को संसद की गरिमा समझनी चाहिए

बजट बहस के दौरान राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर गंभीर आरोप लगाए। एपस्टीन फाइल के जिक्र पर विवाद बढ़ा, बयान कार्यवाही से हटाए गए

राहुल गांधी को संसद की गरिमा समझनी चाहिए

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर संसद की गरिमा को चोट पहुंचाई। उन्होंने संसद में बहस का स्तर गिरा दिया। बात बजट पर करनी थी, लेकिन इसकी आड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने के लिए बे-सिरपैर की बातें कहीं। राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रधानमंत्री मोदी पर एक साथ कई गंभीर आरोप लगाए, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए। इससे स्वतः ही उनके आरोप कमजोर साबित हुए।पहला बड़ा आरोप यह लगाया कि प्रधानमंत्री ने अमेरिका के हाथों देश को बेच दिया है। मोदी की गर्दन अमेरिका ने दबा रखी है, और मोदी ने देशहित का सौदा कर लिया है। इसके बाद राहुल गांधी ने एपस्टीन फाइल का जिक्र किया और कहा कि एपस्टीन फाइल में केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी का नाम है, इसलिए मोदी अमेरिका से डर गए।

राहुल गांधी ने जो कहा, वह लोकसभा की नियम पुस्तिका के खिलाफ था। इसी कारण उनके भाषण के आपत्तिजनक अंशों को संसद की कार्यवाही से हटा दिया गया। राहुल गांधी यह भली-भांति जानते हैं कि उन्होंने जो भी आरोप लगाए हैं, उन्हें साबित करना मुश्किल होगा। तब सवाल उठता है कि आखिर उन्होंने यह हरकत क्यों की? उनका इरादा क्या था?राहुल गांधी ने दुनिया भर में बदनाम जेफरी एपस्टीन का नाम लेकर कहा कि अमेरिका के न्याय विभाग ने एपस्टीन से जुड़ी लगभग 30 लाख फाइलें जारी की हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी का भी नाम है, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डरे हुए हैं।

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा कि जिस एपस्टीन फाइल में उनका नाम आया है, वह नवंबर 2014 की है। उस वक्त वे सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके थे और इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट के लिए काम कर रहे थे। हरदीप पुरी ने स्पष्ट किया कि जिस फाइल में उनका नाम आया है, वह एक ई-मेल है, जो उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट लिंक्डइन के संस्थापक को लिखी थी। उसमें यह कहा गया था कि नरेंद्र मोदी के आने के बाद भारत की इंटरनेट अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, इसलिए लिंक्डइन को भारत में पूंजी निवेश करना चाहिए। इसमें क्या गलत है?

हरदीप पुरी ने यह भी बताया कि वे 2009 में अमेरिका गए थे और करीब आठ साल वहां रहे। इस दौरान वे तीन-चार बार जेफरी एपस्टीन से मिले थे, लेकिन ये कोई वन-टू-वन मुलाकात नहीं थी। राहुल गांधी को एपस्टीन मामले के मुख्य आरोपियों और केवल नाम आने के बीच का फर्क समझना चाहिए।राहुल गांधी जब भी कोई आरोप लगाते हैं, वे टिक नहीं पाते। इसकी वजह यह है कि वे बिना सबूत और बिना ठोस दस्तावेज के आरोप लगाते हैं और अपनी बात कभी साबित नहीं कर पाते। चाहे राफेल विमानों की खरीद का मामला हो या ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा, न जाने कितनी बार राहुल गांधी आरोप लगाकर उन्हें साबित नहीं कर पाए।

हरदीप पुरी के मामले में भी यही हुआ। राहुल गांधी ने राई का पहाड़ बना दिया। एपस्टीन अमेरिका की मुसीबत है, उसे वही संभाले। हमें उसके फटे में पैर डालने की क्या जरूरत है?जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते हैं, वे बता सकते हैं कि डरना, झुकना और गिरना मोदी का स्वभाव नहीं है। अगर डोनाल्ड ट्रंप के आगे झुकना होता तो अमेरिका के साथ डील कई महीने पहले हो जाती। अगर मोदी ट्रंप से समझौता कर लेते, तो कभी 50 प्रतिशत टैरिफ नहीं लगता।

ट्रंप ने भी माना है कि मोदी एक टफ नेगोशिएटर हैं। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पिछले 10 वर्षों में भारत ने सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने सिर उठाकर जीना सीखा है। जो लोग अमेरिका और यूरोप में रहते हैं, वे बताते हैं कि भारत का रुतबा किस कदर बढ़ा है।इसीलिए राहुल गांधी की यह बातें कि मोदी ने भारत बेच दिया या अमेरिका ने मोदी का गला पकड़ लिया है, उनका कोई अर्थ नहीं है। आरोप लगाने और गाली देने में फर्क होता है। गालियों के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं होती।

 

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