Operation Bluestar Memories 1984

ऑपरेशन ब्लू स्टार : एक ऐसी स्मृति जो आज भी मन को व्यथित करती है

ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर एक प्रत्यक्षदर्शी ने 1984 की उन भयावह घटनाओं को याद किया। इस घटना ने अमृतसर ही नहीं बल्कि पूरे देश की सामाजिक चेतना पर गहरे निशान छोड़ दिए।

By : स्वदेश डेस्क
ऑपरेशन ब्लू स्टार : एक ऐसी स्मृति जो आज भी मन को व्यथित करती है

Operation Blue Star

नीरू सिंह ज्ञानी।

6 जून आते ही मेरा मन अनायास ही 1984 की उन भयावह गर्मियों में लौट जाता है। उस समय मैं 14 वर्ष की एक स्कूली छात्रा थी और अपनी गर्मी की छुट्टियाँ अमृतसर में अपने दादा-दादी,नाना नानी परिवार  के घर पर बिता रही थी। मुझे नहीं पता था कि मैं इतिहास के एक ऐसे दर्दनाक अध्याय की साक्षी बनने जा रही हूँ, जिसकी स्मृतियाँ जीवन भर मेरा साथ देंगी।

उस समय न मोबाइल फोन थे, न सोशल मीडिया। समाचारों का एकमात्र माध्यम लोगों की बातचीत, अफवाहें और इधर-उधर से मिलने वाली सूचनाएँ थीं। अचानक अमृतसर का जीवंत वातावरण सन्नाटे में बदल गया। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। रात के अंधेरे में ब्लैकआउट होता था। चारों ओर भय, अनिश्चितता और बेचैनी का माहौल था। कभी-कभी सुनाई देने वाली गोलियों की आवाजें मन को दहला देती थीं।

14 वर्ष की आयु में मैं राजनीतिक परिस्थितियों को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं थी, लेकिन इतना अवश्य समझती थी कि कुछ बहुत दुखद और असाधारण घट रहा है। परिवारों के चेहरों पर चिंता थी, लोग घरों में कैद थे और हर व्यक्ति आने वाले समय को लेकर आशंकित था।

जो दृश्य आज भी मेरी स्मृतियों में अंकित हैं, वे अत्यंत पीड़ादायक हैं। जब कुछ दिन बाद दर्शन करने श्री हरमंदर साहिब पहुंची तो  श्री अकाल तख्त को हुई क्षति ,हरमंदिर साहिब परिसर में मिट्टी के ढेरों में दिखते हुए लाशों के हाथ या पैर ,इमारतों में गोलियों के निशान ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था। हर सिख के लिए श्री हरमंदर साहिब और अकाल तख्त केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, बलिदान और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। उन पर पड़े विनाश के निशान देखकर एक किशोरी के मन को गहरा आघात पहुँचा था। उन दिनों मैंने मानव जीवन की उस त्रासदी को भी देखा, जिसे किसी बच्चे को नहीं देखना चाहिए। लोगों का दर्द, भय और विनाश के दृश्य आज भी स्मृतियों में ताजा हैं।

दुर्भाग्यवश, जून 1984 का दर्द वहीं समाप्त नहीं हुआ। कुछ महीनों बाद 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई। इसके बाद देश के अनेक हिस्सों में भयावह सिख-विरोधी हिंसा भड़क उठी। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार तथा उसके बाद हुए सिख-विरोधी दंगों ने देश के इतिहास पर गहरे घाव छोड़े, जिनकी पीड़ा आज भी असंख्य परिवार महसूस करते हैं। हजारों निर्दोष सिक्खों,नौजवानों परिवारों की हत्या कर दी गई, घरों, व्यवसायों और धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया तथा अनेक परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। इन घटनाओं ने केवल एक समुदाय को ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित किया।

1984 की घटनाओं ने केवल लोगों की जान ही नहीं ली, बल्कि अनगिनत परिवारों के मन पर ऐसे घाव छोड़े जो आज भी पूरी तरह नहीं भर पाए हैं। अनेक बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए, माताओं ने अपने बेटे और पत्नियों ने अपने जीवनसाथी। भय, असुरक्षा और पीड़ा की वे स्मृतियाँ पीढ़ियों तक हस्तांतरित होती रहीं। 1984 का दर्द केवल एक वर्ष या एक घटना का दर्द नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की सामूहिक पीड़ा है जिन्होंने उस दौर को झेला।

चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी 1984 केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। यह उन असंख्य लोगों की पीड़ा, संघर्ष और स्मृतियों का प्रतीक है जिन्होंने उस दौर को सहा। मेरे लिए यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि मेरे बचपन की एक ऐसी स्मृति है जो आज भी मन को व्यथित कर देती है। कर्फ्यू में सिमटा अमृतसर, ब्लैकआउट की रातें, गोलियों की आवाजें, चिंतित चेहरे और अकाल तख्त पर विनाश के निशान-ये सब आज भी मेरी स्मृतियों का हिस्सा हैं।

आज जब हम ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी को स्मरण करते हैं, तो यह केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उन त्रासद घटनाओं से सीख लेने का भी समय है। इतिहास हमें बताता है कि हिंसा, कटुता और अविश्वास का मार्ग अंततः समाज को ही क्षति पहुँचाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम न्याय, संवेदनशीलता, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को और अधिक मजबूत करें।

इस स्मृति दिवस पर मैं उन सभी निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ जिन्होंने 1984 की घटनाओं में अपने प्राण गंवाए। साथ ही उन परिवारों के दुःख को नमन करती हूँ जिन्होंने अपूरणीय क्षति सही। घावों को भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन उनसे सीख लेकर एक अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण भारत का निर्माण अवश्य किया जा सकता है।


 नीरू सिंह ज्ञानी
पूर्व निदेशक, पंजाबी साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश
पूर्व स्वतंत्र निदेशक, मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड

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