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नीट आंदोलन विवाद

नीट आंदोलनः शिक्षा सुधार की लड़ाई या एजेंडा बदलने की कोशिश?

नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक के बाद उत्पन्न आंदोलन में शिक्षा सुधार की मांग के साथ-साथ राजनीतिक नारे भी प्रमुख होने लगे हैं।


नीट आंदोलनः शिक्षा सुधार की लड़ाई या एजेंडा बदलने की कोशिश

नीट, अर्थात राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल प्रवेश परीक्षा, के प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। लाखों विद्यार्थियों की वर्षों की मेहनत, उनके सपने और उनका भविष्य इस एक परीक्षा पर निर्भर करता है। ऐसे में इस परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर आघात हैं। प्रश्नपत्र लीक के आरोप सामने आने के बाद से ही परीक्षार्थियों में चिंता, अभिभावकों में आक्रोश और समाज के विभिन्न वर्गों में असंतोष देखने को मिला है। ऐसी स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष जांच कराए, दोषियों को कठोर दंड दे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करे।

यह भी सत्य है कि अतीत में विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में और अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएँ हुई हैं। किंतु अतीत का हवाला देकर वर्तमान की जिम्मेदारी से बचना किसी लोकतांत्रिक सरकार के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसी प्रकार, इस घटना को लेकर उत्पन्न जनाक्रोश को केवल राजनीतिक हमला कहकर खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा। आज सबसे अधिक महत्व परीक्षार्थियों की न्यायसंगत मांगों और उनके भविष्य को दिया जाना चाहिए।लेकिन इसी के साथ एक गंभीर प्रश्न भी सामने आता है। क्या शिक्षा से जुड़ा यह आंदोलन केवल शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग तक सीमित है, या फिर धीरे-धीरे उसका स्वरूप बदल रहा है?

लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। किंतु जब किसी आंदोलन के मंच पर मूल मुद्दे की अपेक्षा अन्य राजनीतिक अथवा वैचारिक नारे प्रमुख होने लगें, तब उसके वास्तविक उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।नीट विवाद के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू हुआ। कुछ दिनों बाद सोनम वांगचुक ने भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर अनशन प्रारंभ किया। शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है। लेकिन यदि उसी आंदोलन के मंच से ऐसे नारे सुनाई देने लगें, जिनका नीट परीक्षा या प्रश्नपत्र लीक से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या आंदोलन का उद्देश्य बदल रहा है?

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप व्यापक रूप से वायरल हुई। उसमें स्वयं को नीट परीक्षार्थी बताने वाला एक युवक कहता है कि वह और उसके जैसे अनेक विद्यार्थी परीक्षा में हुई अनियमितताओं के विरोध में आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन वहाँ पहुँचने पर उन्होंने देखा कि कई लोग "आजादी" और "आरएसएस हटाओ" जैसे नारे लगा रहे हैं, जिनका नीट प्रश्नपत्र लीक से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। वीडियो में युवक अफसोस व्यक्त करते हुए कहता है कि उनकी मुख्य मांग परीक्षा में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करना था, लेकिन अब आंदोलन के मंच पर ऐसे राजनीतिक नारे लगाए जा रहे हैं, जिनका परीक्षार्थियों की मांगों से कोई संबंध नहीं है। उसका आरोप है कि इससे वास्तविक परीक्षार्थियों की न्यायसंगत मांगें पीछे छूटती जा रही हैं। यदि आंदोलन में भाग लेने वाले विद्यार्थी स्वयं ऐसी चिंता व्यक्त करें, तो आंदोलन की दिशा और उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

शांतिपूर्ण विरोध भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त एक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है। लेकिन यदि इसी अवसर का उपयोग छात्रहितैषी होने का मुखौटा पहनकर भारत-विरोधी शक्तियों का समर्थन करने के लिए किया जाए, तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। यह भी स्मरण रखना चाहिए कि संविधान जहाँ हमें विरोध का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 51(क) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह भी मौलिक कर्तव्य है कि वह भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करे।चिंता का एक अन्य कारण आंदोलन के दौरान कुछ ऐसे व्यक्तियों की उपस्थिति को लेकर उत्पन्न विवाद भी है, जिनके पूर्व वक्तव्य लंबे समय से सार्वजनिक बहस और आलोचना का विषय रहे हैं। उदाहरण के लिए, अरुंधति रॉय द्वारा स्वतंत्र भारत में "आजादी" के नारे को लेकर वर्षों से विवाद रहा है। यही वह भारत है, जिसकी स्वतंत्रता असंख्य वीर सपूतों के बलिदान से प्राप्त हुई। उनके कश्मीर, कश्मीरी हिंदुओं के पलायन और यासीन मलिक जैसे व्यक्तियों को लेकर दिए गए बयानों पर भी लंबे समय से सार्वजनिक विमर्श होता रहा है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे व्यक्तित्व वास्तव में भारत के हित और देश के युवाओं के भविष्य के पक्षधर माने जा सकते हैं?

वास्तव में किसी भी जनआंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी नैतिक विश्वसनीयता होती है। जिस क्षण उस आंदोलन के साथ ऐसे नारे या ऐसे चेहरे जुड़ जाते हैं, जिनकी उपस्थिति मूल मुद्दे को पीछे धकेल देती है, उसी क्षण समाज के एक वर्ग का समर्थन कमजोर पड़ने लगता है। यदि आंदोलन का उद्देश्य परीक्षार्थियों को न्याय दिलाना है, तो वही उसका एकमात्र केंद्रबिंदु होना चाहिए। यदि उसके साथ कोई अन्य राजनीतिक या वैचारिक एजेंडा जुड़ जाता है, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं विद्यार्थियों को होता है, जिनके हितों की रक्षा के नाम पर आंदोलन शुरू हुआ था।

भारतीय लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। वास्तव में, एक मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाता है। सरकार की नीतियों या प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध विरोध दर्ज कराना भी पूरी तरह वैध है। किंतु सरकार-विरोध और राष्ट्र-विरोध के बीच एक स्पष्ट और मूलभूत अंतर है। किसी निर्वाचित सरकार की नीतियों की आलोचना करना एक बात है, जबकि ऐसे नारे या विचार सामने लाना, जो देश की संवैधानिक व्यवस्था अथवा राष्ट्रीय एकता को चुनौती दें, बिल्कुल अलग बात है। यदि इन दोनों के बीच की रेखा धुंधली हो जाए, तो आंदोलन की वास्तविक मंशा पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

आज सोशल मीडिया जनमत निर्माण का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। कुछ ही सेकंड का एक वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुँच सकता है। इसलिए किसी भी आंदोलन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की यह जिम्मेदारी है कि उसका संदेश स्पष्ट हो और मूल मुद्दा केंद्र में बना रहे। यदि आंदोलन के मंच से ऐसे नारे उठते हैं, जिनका सामान्य परीक्षार्थियों की मांगों से कोई संबंध नहीं है और जिन्हें राष्ट्रीय अखंडता के विरुद्ध माना जाता है, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।नीट प्रश्नपत्र लीक मामले में देश का प्रत्येक नागरिक चाहता है कि सत्य सामने आए, दोषियों को दंड मिले, परीक्षार्थियों को न्याय प्राप्त हो और शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास पुनः स्थापित हो। लेकिन यदि इस न्यायसंगत मांग को किसी अन्य राजनीतिक या वैचारिक संघर्ष से जोड़ दिया जाए, तो मूल मुद्दा पीछे छूटने का खतरा बना रहता है। अंततः सबसे अधिक नुकसान उन्हीं छात्रों का होता है, जिनके भविष्य की रक्षा के उद्देश्य से यह आंदोलन प्रारंभ हुआ था। इसलिए आज सबसे आवश्यक है कि आंदोलन का लक्ष्य स्पष्ट बना रहे।


दिगंत चक्रवर्ती
(लेखक जागरण जोश अवॉर्डी युवा स्तंभकार हैं।)

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