प्रधानमंत्री मोदी के नशा मुक्त भारत अभियान का समर्थन जरूरी है परन्तु समस्या के समाधान हेतु केवल संदेश पर्याप्त नहीं, सख्त कदम भी आवश्यक हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत' संकल्प अभियान का स्वागत किया जाना चाहिए, पर तेजी से नासूर बनती जा रही इस समस्या का समाधान मात्र संदेश नहीं, सख्ती से ही संभव है। इस अभियान के अंतर्गत 100 सप्ताह तक हर रविवार को खेल, कला और संस्कृति आदि गतिविधियों के माध्यम से देश भर में युवाओं को नशा मुक्ति का संदेश दिया जाएगा। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, सामाजिक संस्थाओं और औद्योगिक संगठनों के अलावा 100 से भी ज्यादा आध्यात्मिक संगठनों के सहयोग से यह अभियान चलाया जाएगा।
जागरूकता की दृष्टि से यह निश्चय ही एक बड़ा अभियान होगा। तेजी से युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रही नशे की लत के विरुद्ध जागरूकता अभियान की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, पर स्वयं प्रधानमंत्री भी कह चुके हैं कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का हिस्सा है। ऐसे में 100 रविवार का जागरूकता अभियान मात्र चला कर नशा मुक्त भारत का सपना आशावाद का ज्यादा नजर आता है।बेशक, नशे की समस्या भारत में हाल-फिलहाल पैदा नहीं हुई। कभी पूर्वोत्तर से शुरू हुई यह लत सीमावर्ती पंजाब और पड़ोसी हरियाणा तक पहुंच चुकी है। इससे अछूता रहने का दावा तो शायद ही कोई राज्य कर पाए, क्योंकि गुजरात के बंदरगाहों तक पर बड़ी-बड़ी खेप जब्त हुई हैं। प्रधानमंत्री का दावा है कि ड्रग्स तस्करी के विरुद्ध कार्रवाई पहले की तुलना में कई गुना बढ़ी है, लेकिन तरह-तरह के ड्रग्स की देश के दूरदराज क्षेत्रों में भी सहज उपलब्धता उसे नाकाफी ही साबित करती है।
यह तो खुला रहस्य है कि तमाम तरह का नशा सीमा पार से तस्करी होकर ही भारत आता है। भारत की भौगोलिक स्थिति के मद्देनजर यह काम दशकों से चल रहा है। सच यह भी है कि ड्रग्स तस्करी अब आतंकवादियों की फंडिंग का बड़ा स्रोत बन चुकी है। नापाक पड़ोसी पाकिस्तान हमारे देश में नशा तस्करी का एकमात्र स्रोत तो नहीं है, लेकिन शायद सबसे बड़ा स्रोत वही है। विभाजन के जरिये अस्तित्व में आने के बाद से ही पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध बहुआयामी छद्म युद्ध छेड़ रखा है। कश्मीर से पंजाब तक वह न सिर्फ आतंकवाद का पालन-पोषण कर रहा है, बल्कि उसके लिए धन भी नशा तस्करी और जाली करेंसी के जरिये भारत से ही जुटा रहा है।
कहना नहीं होगा कि नशा तस्करी जहां भारतीय युवाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बना रही है, वहीं जाली करेंसी अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है। बेशक, भारत इससे अनभिज्ञ नहीं है और हरसंभव कदम भी उठा रहा है, लेकिन पाकिस्तानी दुष्चक्र को पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सका है। सीमावर्ती पंजाब में युवाओं को नशे ने इस कदर खोखला कर दिया कि उस पर 'उड़ता पंजाब' जैसी फिल्म भी बन चुकी है।युवा किसी भी देश का भविष्य होते हैं। फिर भारत तो वैसे ही युवा आबादी बहुल देश है। ऐसे में युवाओं के नशे के दलदल में फंसने का दुष्प्रभाव देश के वर्तमान ही नहीं, भविष्य पर भी दूरगामी होगा। तमाम तरह के नशे जिस तेजी से भारतीय युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं, उसके आंकड़े डरावने हैं, पर उस पर अपेक्षित चिंता सरकारों और उनकी एजेंसियों में नजर आती नहीं।
भारत का संविधान 'मद्य निषेध' की सोच रखता है, पर देश में 15 करोड़ से भी ज्यादा लोग शराब पीते हैं, जिसकी जायज बिक्री के एवज में सरकारें मोटा राजस्व वसूलती हैं और शराब की बोतल एवं दुकानों पर चेतावनी लिखवा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझती हैं। देश में लगभग तीन करोड़ लोग गांजे का सेवन करते हैं, जबकि दो करोड़ के आसपास हेरोइन आदि ड्रग्स का नशा करते हैं। आंकड़े तब और भी डरावने हो जाते हैं, जब पता चले कि इन नशाखोरों में किशोर और युवा भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।
इस समस्या से लड़ने और उबरने में मदद के लंबे-चौड़े दावे भी किए जाते हैं, लेकिन कड़वा सच यह है कि नशे की लत के शिकार 80-90 प्रतिशत लोगों को तो इलाज ही नहीं मिल पाता। ज्यादातर नशा मुक्ति केंद्र भी यातना केंद्र बन गए हैं। भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग पौने छह करोड़ लोग शराब पीने से होने वाली समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2020 में भारत में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 3.1 लीटर थी, जो 2023 में 3.2 लीटर हो गई और 2028 में 3.4 लीटर हो जाने की संभावना है। भारत में 60 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया शराब का बाजार बताता है कि कारोबारी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं और सरकारें भरपूर राजस्व वसूल रही हैं।
अन्य ड्रग्स का कारोबार गैरकानूनी है, इसलिए उसकी बाबत ऐसे ठोस आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि चोरी-छिपे बिकने वाली चीज मुंहमांगी कीमत पर ही मिलती है और उसके कारोबार से होने वाला मुनाफा भी अकूत होता है। तभी तो लोग ऐसे जोखिमभरे कारोबार में दांव लगाते हैं और पुलिस-प्रशासन से लेकर खरीददारों तक अपना नेटवर्क बनाते हैं। ऐसे में नशाखोरी का मर्ज तेजी से नासूर ही बनता जा रहा है।वैसे तो इलाज की कोई ईमानदार कोशिश नजर आती नहीं, फिर भी सरकारी दावों पर भरोसा करें तो कहना पड़ेगा- 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की', पर अब तो मर्ज इलाज की हद से गुजर चुका है। अब इसकी शल्य चिकित्सा ही हो सकती है, जिसके लिए सबसे पहले व्यवस्था की शल्य चिकित्सा करनी होगी, क्योंकि बिना व्यवस्था के संरक्षण के ड्रग्स तस्करी सरीखा संगठित आपराधिक कारोबार भारत में फल-फूल ही नहीं सकता था।
पूर्वोत्तर से लेकर पंजाब तक राजनेताओं और पुलिस-प्रशासन की संलिप्तता की चर्चाएं आम रही हैं, लेकिन इन खास लोगों की लगाम कसने का साहस अभी तक तो किसी ने नहीं दिखाया। अगर प्रधानमंत्री मोदी नशे के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाने के साथ ही भ्रष्ट व्यवस्था की शल्य चिकित्सा भी कर पाए, तो अवश्य नशा मुक्त भारत का सपना साकार हो सकता है।

राजकुमार सिंह
(लेखक दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व संपादक हैं)