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मोदी बने सबसे लंबे समय तक PM

नेहरू के रिकॉर्ड के साथ-साथ उनके वैचारिक ढांचे को तोड़ती मोदी की विदेश नीति

डॉ. पवन चौरसिया


नेहरू के रिकॉर्ड के साथ-साथ उनके वैचारिक ढांचे को तोड़ती मोदी की विदेश नीति

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास में 10 जून 2026 की तारीख सदा के लिए दर्ज हो जाएगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी इस दिन भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन जाएंगे. वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 4398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए बतौर प्रधानमंत्री 4399 दिन पूरे करेंगे. गुजरात के अत्यंत साधारण गैर-राजनीतिक परिवार से आने वाले और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे मोदी का 2014 से लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतना और इतने लम्बे समय तक विविधताओं वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश, यानि भारत का निरंतर प्रधानमंत्री बने रहना अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है. अपने बारह वर्ष के शासनकाल में मोदी ने अनेकों मोर्चों पर कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं और वैश्विक स्तर पर भारत को एक नई पहचान दिलाई है. संघ की ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से प्रभावित मोदी की सरकार की हर नीति 2047 तक देश को ‘विकसित भारत’ बनाने की दिशा में अग्रसर है, फिर चाहे वो उनकी सामाजिक नीति हो, आर्थिक नीति हो या फिर उनकी विदेश नीति. वैश्विक ऊहापोह और अराजकता के इस दौर में यदि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को साध पाने में सफल हो पा रहा है तो इसका कारण मोदी के बारह वर्ष के कार्यकाल में अपनाई गई विदेश नीति है, जिसकी प्रशंसा और जिसका अध्ययन विदेश नीति के पंडित एवं जानकार बड़ी बारीकी से कर रहे हैं.

2014 में जब मोदी ने देश की सत्ता संभाली तो कई विश्लेषकों को यह आशंका थी कि चूंकि वो कभी भी केंद्र सरकार के किसी भी पद में नहीं रहे हैं, इस कारण शायद मोदी इस मामले में अपेक्षाकृत उतने सफ़ल नहीं होंगे. परन्तु इतने वर्षों में जिस तरह से मोदी के राज में भारत की वैश्विक साख और सम्मान में वृद्धि हुई है, उससे उनके आलोचक भी नहीं नकार सकते हैं. कई टिप्पणीकारों का मानना है कि मोदी ने भी भारत की विदेश नीति में उसी तरह की रूचि दिखाई है, जिस तरह से नेहरु दिखाया करते थे. सनद रहे कि नेहरु प्रधानमंत्री के साथ-साथ पंद्रह वर्ष से अधिक देश के विदेश मंत्री भी रहे. और इसी लिए लम्बे वक्त तक भारतीय विदेश नीति में उनके वैचारिक दृष्टिकोण की छाप देखने को मिली. हालाँकि इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन साल 2014 में मोदी के सत्ता सँभालने के बाद देखने को मिला है.

नेहरू और मोदी की तुलना के आधार

इस बात में तो कोई संशय नहीं है कि किसी भी वर्तमान नेता की अतीत में किसी दूसरे नेता से तुलना करना अपने आप में बहुत जटिल काम है, क्योंकि दोनों अलग अलग परिपेक्ष एवं काल खंड में कम कर रहे होते हैं. परन्तु चूंकि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने नेहरू के रिकॉर्ड को तोड़ा है तो ऐसे में दोनों के बीच तुलना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है. जहां तक बात विदेश नीति की है तो इस मामले में दोनों नेताओं की समझ में कुछ आमूलचूल अंतर है जिसके कारण दोनों की नीतियों में भिन्नता बहुत साफ़ हो जाती है.

सबसे पहला अंतर तो दोनों नेताओं के अपने देश भारत को परिभाषित करने में ही दिखाई देता है. समाजवाद, आदर्शवाद और आधुनिकतावाद जैसी यूरोपीय विचारधारा के चश्मे से दुनिया को देखने वाले नेहरू के लिए भारत एक देश और एक राष्ट्र-राज्य के रूप में सन 1947 में अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अस्तित्व में आया, और अंग्रेज़ी के आने से पहले जिसका कोई अस्तित्व था ही नहीं. वहीं मोदी के लिए भारत वो ‘सभ्यतागत राज्य’ है जिसकी संस्कृति और इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, जो लोकतंत्र की जननी रहा है, जिसने अतीत में पूरे विश्व को अपने ज्ञान से रौशन किया है, और जो पुरातन कल से अस्तित्व में है; जो 1947 में महज़ अंग्रेजी उपनिवेशवाद से बाहर आया था.

दोनों नेताओं में दूसरा अंतर है भारत की सांस्कृतिक धरोहर को उसकी विदेश नीति से जोड़ने को लेकर. जहाँ एक ओर नेहरू मानते थे कि चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, जहां मुसलमान बड़ी संख्या में रहते हैं, इसी लिए इसको उसकी हिन्दू संस्कृति और इतिहास से दूर रखना चाहिए, ताकि मुसलमानों की भावनाएं न आहत हों. और इसी लिए उनके कार्यकाल में भारत हर पटल पर स्वयं को एक आधुनिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में प्रस्तुत करता रहा, जिसका अस्तित्व और आधार सिर्फ उसकी वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था से है. परन्तु मोदी जी ने भारत की प्राचीन सनातन सभ्यता को उसकी विदेश नीति से दूर करने के बजाए उसे और मजबूती के साथ जोड़ दिया है. भारत की प्राचीन सभ्यता की नींव पर आगे बढ़ते हुए मोदी ने पंचामृत (पांच अमृत) को विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें गरिमा, संवाद, समृद्धि और सुरक्षा के साथ-साथ सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंध को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है. इससे राजकीय यात्राओं और बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान भारत की विरासत, जैसे कि बौद्ध पर्यटन स्थल, आयुर्वेद, शास्त्रीय कलाएं और आध्यात्मिक परंपराएं आदि को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने में मदद मिली है, जिससे भारत समकालीन चुनौतियों के लिए प्राचीन ज्ञान साझा करने वाले विश्व गुरु के रूप में स्थापित हुआ है.

तीसरा अंतर है दोनों नेताओं की कूटनीतिक रणनीति को लेकर. जहाँ नेहरू भारत को आदर्शवाद, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर अंधविश्वास, गुट-निरपेक्ष और उपनिवेशवाद-विरोधी विचारधारा के ढांचे में ही रखते थे, वहीँ मोदी के नेतृत्व में भारत यथार्थवाद, हित आधारित सम्बन्ध स्थापन और बहु-संरेखण की विचारधारा को अपनाते हुए न केवल अपनी सामरिक स्वायत्ता को बरकरार रखे हुए है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को भी बेहतरीन रूप से साध रहा है. इस बात को हम कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं. पहला उदाहरण है चीन को लेकर नेहरू की समझ के बारे में. अपनी आदर्शवाद, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अति विश्वास और उपनिवेशवाद-विरोधी व उदारवादी अंतरराष्ट्रीयतावाद की विचारधारा के चलते नेहरू चीन पर विश्वास करने की गलती कर बैठे, जिसका नुकसान भारत को 1962 की भारत-चीन जंग के रूप में उठाना पड़ा.

दूसरा उदाहरण है कश्मीर समस्या. नेहरू ने शांतिवाद और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विश्वास पर आधारित नैतिक कूटनीति से प्रेरित होकर 1 जनवरी 1948 को कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास इस उम्मीद से भेज दिया कि अंतरराष्ट्रीय देखरेख में जनमत संग्रह के ज़रिए इसका जल्द और निष्पक्ष समाधान निकल आएगा. उनके इस कदम ने कानूनी विलय और सैन्य ज़रूरत से जुड़े एक द्विपक्षीय मुद्दे को एक लंबे अंतरराष्ट्रीय विवाद में बदल दिया. इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव 47 (1948) आया, युद्धविराम रेखाएं बनीं और पाकिस्तान ने बार-बार इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया, जिससे दशकों तक भारत की स्थिति जटिल बनी रही.

दूसरी ओर मोदी ने जम्मू-कश्मीर को भारत में पूरी तरह से शामिल करने से जुड़े अपने साहसिक कदमों के ज़रिए इस विरासत को निर्णायक रूप से सुधारा है. 5 अगस्त 2019 को उनकी सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश और संसदीय प्रस्ताव के माध्यम से अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A को खत्म कर दिया और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) के रूप में भारतीय संघ में पूरी तरह से शामिल कर लिया. इससे वह विशेष दर्जा खत्म हो गया जिससे घाटी में पाकिस्तान प्रायोजित अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा मिलता था. उनके इस कदम के पीछे मोदी की पार्टी के वैचारिक जनक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का वो सपना था जिसके अंतर्गत वो कश्मीर में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान की व्यवस्था लागू कराना चाहते थे.

गतिशील यथार्थवाद बनाए रखना ज़रूरी

बतौर प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय विदेश नीति को लचीली और गतिशील बना दिया है, जिससे भारत परस्पर विरोधी खेमों जैसे कि अमरीका और रूस, ईरान और इजरायल आदि से भी लाभ ले पा रहा है. परंतु बदलते हुए वैश्विक समीकरणों को साधना भारत के लिए बड़ी चुनौती होने वाली है. मोदी के आलोचकों का मानना है कि भारत अब अपनी विदेश नीति में नैतिकता के बजाए अपने लाभ को अधिक महत्व देता है. लेकिन बारह सालों का अनुभव यही बताता है कि जिस तरह से भूराजनीति बदल गई उसके देखते हुए वर्तमान समय में यही नीति ही सही है. ऐसे में मोदी के नेतृत्व में भारत को आदर्शवाद के प्रलोभन में न पड़ते हुए अपनी विदेश नीति में गतिशील यथार्थवाद बनाए रखना चाहिए ताकि उसके राष्ट्रीय हितों को कोई हानि न पहुँचे.

लेखक डॉ. पवन चौरसिया, रिसर्च फेलो, इंडिया फाउंडेशन

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