ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंधों के बाद, भारत में भी इसी तरह के कदम उठाने की मांग बढ़ रही है।
अनुराग तागड़े
मानव सभ्यता आज एक ऐसे ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजर रही है जहाँ युद्धों का स्वरूप बदल चुका है। अब सीमाओं पर टैंक और तोपें ही नहीं लड़तीं, बल्कि विचार, सूचनाएँ, एल्गोरिदम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी संघर्ष के प्रमुख आयाम बन चुके हैं। जिस प्रकार उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में औपनिवेशिक शक्तियों ने भूभागों पर अधिकार स्थापित किया था, उसी प्रकार इक्कीसवीं शताब्दी में वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियाँ मानव चेतना, व्यवहार और सामाजिक संरचनाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हैं। इस परिघटना को अनेक विद्वान "डिजिटल उपनिवेशवाद" की संज्ञा देते हैं।
इसी संदर्भ में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैर स्ट्रॉमेर द्वारा 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिबंध की घोषणा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता के समक्ष उपस्थित एक गहन नैतिक प्रश्न है। ब्रिटिश सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया अब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक विकास और व्यक्तित्व निर्माण के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। इस निर्णय को ब्रिटेन के लगभग 90 प्रतिशत अभिभावकों का समर्थन प्राप्त हुआ है।यह घटना विश्व को एक महत्वपूर्ण संदेश देती है वे राष्ट्र जो कभी डिजिटल स्वतंत्रता के सबसे बड़े समर्थक थे, आज स्वयं डिजिटल अनुशासन और नियंत्रण की आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं।प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि उदार लोकतंत्रों को बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध जैसे कठोर कदम उठाने पड़े? उत्तर अत्यंत चिंताजनक है।
सोशल मीडिया मूलतः संवाद, संपर्क और अभिव्यक्ति का माध्यम था। किंतु समय के साथ यह मानव ध्यान को नियंत्रित करने वाला एक विशाल आर्थिक उद्योग बन गया। आज फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, स्नैपचैट, यूट्यूब और एक्स जैसे मंच उपयोगकर्ता को सूचना देने से अधिक उसे अपने मंच पर अधिकतम समय तक रोके रखने के लिए निर्मित किए गए हैं। इनके एल्गोरिदम मानव मनोविज्ञान की कमजोरियों का उपयोग करते हैं। लाइक्स, कमेंट्स, शेयर, रील्स, नोटिफिकेशन और अनंत स्क्रॉलिंग जैसी व्यवस्थाएँ व्यक्ति के मस्तिष्क में डोपामाइन का निरंतर स्राव उत्पन्न करती हैं, जिससे धीरे-धीरे डिजिटल निर्भरता और अंततः डिजिटल व्यसन जन्म लेता है।
सबसे अधिक प्रभावित वह वर्ग होता है जिसकी मानसिक संरचना अभी विकसित हो रही होती है अर्थात बच्चे और किशोर।
भारत विश्व का सर्वाधिक युवा राष्ट्र है। लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति हमारी सबसे बड़ी संपत्ति भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। किंतु विडंबना यह है कि आज भारतीय बाल्यावस्था और किशोरावस्था एक अभूतपूर्व डिजिटल संकट के बीच खड़ी है।एक दशक पूर्व तक बच्चे विद्यालय से लौटकर खेल के मैदानों की ओर जाते थे। आज वही बच्चे विद्यालय से लौटकर मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठ जाते हैं। कभी परिवारों में दादा-दादी की कहानियाँ बच्चों की कल्पनाशक्ति का विस्तार करती थीं आज एल्गोरिदम उनके विचारों का निर्माण कर रहे हैं।यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत भी है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव बाल्यावस्था को संस्कार-निर्माण का काल माना है। हमारे शास्त्रों में जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास जैसे चरणों में विभाजित किया गया है। ब्रह्मचर्य आश्रम का मूल उद्देश्य था एकाग्रता, अनुशासन, आत्मसंयम और ज्ञानार्जन। किंतु वर्तमान डिजिटल व्यवस्था बालक को एकाग्रता नहीं, बल्कि चंचलता प्रदान कर रही है; आत्मसंयम नहीं, बल्कि त्वरित संतुष्टि की आदत दे रही है।सोशल मीडिया ने किशोरों के समक्ष तुलना का एक कृत्रिम संसार निर्मित कर दिया है। अब बच्चा अपने वास्तविक जीवन की तुलना हजारों अज्ञात व्यक्तियों के संपादित और सजावटी जीवन से करता है। परिणामस्वरूप हीनभावना, असंतोष, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।विश्व के अनेक अध्ययनों में यह पाया गया है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग से चिंता, अवसाद, आत्मघाती प्रवृत्तियाँ, नींद की समस्याएँ तथा आत्मसम्मान में कमी जैसी स्थितियाँ बढ़ रही हैं। ब्रिटिश संसद के लिए तैयार शोध दस्तावेजों में भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को गंभीर चिंता का विषय बताया गया है।
भारत में स्थिति और भी जटिल है क्योंकि यहाँ डिजिटल साक्षरता की तुलना में डिजिटल पहुँच कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ी है।आज गाँवों तक स्मार्टफोन पहुँच चुके हैं, किंतु डिजिटल विवेक नहीं पहुँचा।मोबाइल पहुँच गया, परंतु मीडिया साक्षरता नहीं पहुँची।इंटरनेट पहुँच गया, परंतु आत्मनियंत्रण नहीं पहुँचा।परिणामस्वरूप बच्चे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अश्लीलता, साइबर अपराध, ऑनलाइन जुआ, फर्जी समाचार, कट्टरपंथी प्रचार, घृणा अभियानों और डिजिटल ठगी के संपर्क में भी आ रहे हैं।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो तथा विभिन्न साइबर सुरक्षा एजेंसियों के आँकड़े लगातार संकेत दे रहे हैं कि किशोरों को लक्षित करने वाले साइबर अपराधों में वृद्धि हो रही है।
ऑनलाइन गेमिंग, फर्जी मित्रता, डिजिटल ब्लैकमेलिंग और साइबर बुलिंग जैसी समस्याएँ अब सामान्य होती जा रही हैं।सबसे अधिक चिंतित भारतीय अभिभावक हैं।देश के महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक माता-पिता एक समान पीड़ा व्यक्त करते हैं बच्चे घर में उपस्थित तो हैं, परंतु परिवार के साथ नहीं हैं।रात्रि भोजन के समय संवाद समाप्त हो चुका है।परिवारों में मौन बढ़ रहा है।संबंधों में आत्मीयता घट रही है।माता-पिता का सबसे बड़ा भय यह नहीं है कि बच्चे सोशल मीडिया देख रहे हैं; उनका भय यह है कि कहीं सोशल मीडिया ही बच्चों का व्यक्तित्व निर्मित न करने लगे।यही कारण है कि ब्रिटेन में जिस प्रकार लगभग 90 प्रतिशत अभिभावकों ने सोशल मीडिया प्रतिबंध का समर्थन किया, उसी प्रकार भारत में भी बड़ी संख्या में माता-पिता कठोर डिजिटल नियंत्रणों की मांग कर रहे हैं।
किंतु क्या प्रतिबंध ही अंतिम समाधान है? यहीं से विमर्श का दूसरा पक्ष आरंभ होता है।ऑस्ट्रेलिया ने 2024 में विश्व का पहला व्यापक कानून पारित किया जिसके अंतर्गत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर रोक लगाई गई। यह व्यवस्था 2025 में लागू हुई और प्लेटफॉर्मों को आयु सत्यापन अनिवार्य करना पड़ा। उल्लंघन की स्थिति में भारी आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया।ऑस्ट्रेलिया के अनुभवों से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। लाखों नाबालिग खातों को हटाया गया, किंतु अनेक किशोरों ने तकनीकी उपायों द्वारा प्रतिबंधों को पार करने के तरीके भी खोज लिए। कुछ शोधों में यह भी पाया गया कि केवल तकनीकी प्रतिबंध समस्या का पूर्ण समाधान नहीं बन सका।इससे यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल समस्या का समाधान केवल कानूनी नहीं हो सकता; उसे सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी संबोधित करना होगा।भारत को इस विषय में अंधानुकरण नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण नेतृत्व प्रदर्शित करना चाहिए।
भारत यदि सीधे पूर्ण प्रतिबंध लागू करता है तो उसके अनेक व्यावहारिक प्रश्न उत्पन्न होंगे।क्या आयु सत्यापन प्रणाली पर्याप्त सक्षम है?क्या ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रभावी क्रियान्वयन संभव होगा?क्या बच्चे वीपीएन और अन्य तकनीकी उपायों द्वारा प्रतिबंधों को निष्प्रभावी नहीं कर देंगे?क्या शिक्षा और कौशल विकास के लिए उपयोगी डिजिटल मंचों तक उनकी पहुँच बाधित नहीं होगी?
इन प्रश्नों पर गंभीर विचार आवश्यक है। भारत को पूर्ण प्रतिबंध से पहले बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा मॉडल अपनाना चाहिए।16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खातों हेतु कठोर आयु सत्यापन अनिवार्य किया जाए। विद्यालयों में "डिजिटल नागरिकता" और "मीडिया साक्षरता" को अनिवार्य विषय बनाया जाए।सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों के लिए विशेष सुरक्षित संस्करण विकसित करने हेतु बाध्य किया जाए। रात्रिकालीन उपयोग, अनंत स्क्रॉलिंग, एल्गोरिदमिक लत और अजनबियों से संवाद जैसी सुविधाओं पर नियंत्रण स्थापित किया जाए।माता-पिता को डिजिटल पालन-पोषण का प्रशिक्षण दिया जाए।क्योंकि अंततः किसी भी समाज का भविष्य कानूनों से नहीं, संस्कारों से सुरक्षित होता है।
वर्तमान समय में सबसे बड़ा संकट तकनीक नहीं, बल्कि तकनीक के उपयोग की संस्कृति है।यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को केवल कुशल उपभोक्ता नहीं, बल्कि संवेदनशील नागरिक, सृजनशील चिंतक और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व बनाना चाहते हैं, तो हमें डिजिटल अनुशासन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।ब्रिटेन का निर्णय संभवतः इतिहास में उस क्षण के रूप में दर्ज होगा जब आधुनिक सभ्यता ने पहली बार स्वीकार किया कि तकनीकी प्रगति और मानवीय कल्याण हमेशा समानार्थी नहीं होते।कभी-कभी समाज को अपने बच्चों की रक्षा के लिए प्रगति की गति पर भी प्रश्नचिह्न लगाना पड़ता है।
भारत के समक्ष भी वही प्रश्न खड़ा है क्या हम अपने बच्चों को एल्गोरिदम के हवाले कर देंगे? या फिर हम ऐसी डिजिटल व्यवस्था निर्मित करेंगे जिसमें तकनीक मानवता की सेवक बने, स्वामी नहीं?यह केवल नीति का नहीं, राष्ट्र के भविष्य का प्रश्न है।और इस प्रश्न का उत्तर हमें अभी देना होगा, क्योंकि यदि बचपन ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो भविष्य की कोई भी विकास गाथा सार्थक नहीं होगी।