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आपातकाल की आपबीती

आपातकाल की आपबीती: जेल की सलाखों के बीच जला उम्मीद का मशाल जुलूस

भारतीय आपातकाल के दौरान बंदी राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने जेल के भीतर मशाल जुलूस निकाल कर उम्मीद और संघर्ष की नई ज्योति जलाई।


आपातकाल की आपबीती जेल की सलाखों के बीच जला उम्मीद का मशाल जुलूस  

आपातकाल की घोषणा के बाद देशभर में हजारों राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं और अनेक निदर्दोष नागरिकों को मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। श्रीराम अरावकर बताते हैं कि जब 25 जून 1976 को आपातकाल की अवधि एक वर्ष और बढ़ा दी गई, तब जेलों में बंद अनेक कार्यकर्ताओं की चिंता और गहरी हो गई। जिनके परिवार उनके सहारे थे, वे उनकी आजीविका और भविष्य को लेकर व्याकुल थे। जेल के वातावरण में निराशा और अनिश्चितता का अंधेरा फैलने लगा। इसी कठिन समय में तत्कालीन होशंगाबाद जिला प्रचारक स्वर्गीय संतोष त्रिवेदी और विद्यार्थी परिषद के तत्कालीन प्रांतीय संगठन मंत्री सूर्यकांत केलकर ने बंदियों में नया उत्साह जगाने की योजना बनाई। रात के समय भोपाल केंद्रीय जेल के भीतर मशाल जुलूस निकाला गया। मीस्राबंदियों ने पूरे जोश के साथ संघ गीत गाया-

'रोक सकेंगे नहीं विरोधक, संघ शक्ति का प्रबल प्रवाह। यह मानस से आती गंगा, रोकेगा कौन इसकी राह।'

गीत की गूंज और मशालों की रोशनी ने जेल के उदास वातावरण को बदल दिया। निराशा की जगह विश्वास ने ले ली और हर मन में यह संकल्प जागा कि सत्य और लोकतंत्र की विजय निश्चित होगी।

श्री अरावकर बताते हैं कि आपातकाल के दौरान पुलिस का भय, प्रशासनिक दमन और निदर्दोष लोगों की गिरफ्तारियां आम बात थीं। लोग इंदिरा गांधी, संजय गांधी और कांग्रेस का नाम लेने तक से कतराने लगे थे। किसी भी प्रकार का सार्वजनिक एकत्रीकरण संदेह की दृष्टि से देखा जाता था और बिना सुनवाई गिरफ्तारी कर ली जाती थी। उनका मानना है कि यही अत्याचार बाद में आम जनता के जनाक्रोश का कारण बना और चुनाव में इंदिरा गांधी की पराजय की मजबूत नींव भी।

उस समय श्रीराम अरावकर भोपाल के शिवाजी नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षक थे और दो सायंकालीन शाखाओं का दायित्व भी संभाल रहे थे। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद विद्यालय समिति ने भी सत्याग्रह का निर्णय लिया। श्रीमती सविता वाजपेयी के नेतृत्व में 14 नवंबर 1975 को पुराने भोपाल में आंदोलन हुआ, जिसमें नी लोगों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। पहले उन्हें थाने ले जाकर धमकाया गया और बाद में जेल भेज दिया गया। श्री अरावकर लगभग 16 महीने तक मौसाबंदी रहे और आपातकाल समाप्त होने के बाद रिहा हुए।

वे बताते हैं कि इसके बाद भी आंदोलन लगातार चलता रहा। बड़ी संख्या में युवाओं और विद्यार्थियों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए सत्याग्रह का मार्ग अपनाया। इससे विचलित प्रशासन ने कई स्थानों पर आंदोलनकारियों के साथ मारपीट और कठोर व्यवहार किया, लेकिन संघ का स्पष्ट आग्रह था कि संघर्ष पूरी तरह अहिंसक रहे और जनता के बीच तानाशाही के विरुद्ध जनमत तैयार किया जाए।

श्री अरावकर बताते है कि आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने केवल आंदोलन ही नहीं किया, बल्कि जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के परिवारों की चिंता भी अपने दायित्व के रूप में निभाई। स्वयंसेवकों ने धन संग्रह किया, राशन और आवश्यक सामग्री जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाई तथा अनेक कार्यकर्ता भूमिगत रहकर यह सेवा कार्य करते रहे। वे बताते हैं कि उस समय उनका परिवार बड़े भाई के साथ होने के कारण आर्थिक संकट से बच गया, लेकिन जेल में रहने की अनिश्चितता ने परिजनों की चिंता अवश्य बढ़ा दी।

आपातकाल समाप्त होने के बाद श्रीराम अरावकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नगर, तहसील, जिला और विभाग प्रचारक सहित अनेक दायित्व निभाए। वर्ष 1998 से उन्होंने विद्याभारती में प्रांत संगठन मंत्री, क्षेत्र संगठन मंत्री, अखिल भारतीय मंत्री, अखिल भारतीय महामंत्री और वर्तमान में अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री के रूप में शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण के कार्य को नई दिशा दी। उनके अनुसार, आपातकाल ने यह सिखाया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि जागरूक, साहसी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों के सतत संघर्ष से होती है।

भोपाल। वर्ष 1975 का आपातकाल केवल राजनीतिक दमन का दौर नहीं था, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्त्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रवादी विचारों की कठोर परीक्षा का कालखंड भी था। जेलों की ऊंची दीवारों के भीतर बंद हजारों मीसाबंदियों के सामने सबसे बड़ी चिंता अपनी नहीं, बल्कि घर-परिवार के भविष्य की थी। ऐसे निराशाजनक वातावरण में भोपाल केंद्रीय जेल के भीतर निकला एक मशाल जुलूस आशा, साहस और संघर्ष का प्रतीक बन गया। विद्याभारती के अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री श्रीराम अरावकर उस दौर को याद करते हुए बताते है कि अत्याचार के अंधकार में भी लोकतंत्र की ज्योति बुझने नहीं दी गई।

 

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