The Indian women's cricket team's victory at Lord's is not just a win, but a pivotal moment shaping the future of Indian cricket.
अनुराग तागड़े
भारतीय महिला क्रिकेट के लिए लॉर्ड्स की ऐतिहासिक जीत केवल एक टेस्ट मैच की विजय नहीं है, बल्कि यह भारतीय क्रिकेट की दिशा बदलने वाला क्षण है। जिस लॉर्ड्स के ऑनर्स बोर्ड पर नाम दर्ज कराना किसी भी क्रिकेटर का आजीवन सपना माना जाता है, वहां भारतीय महिला टीम ने इंग्लैंड को उसके ही घर में पराजित कर यह संदेश दे दिया है कि अब भारतीय महिला क्रिकेट सम्मान पाने की नहीं, बल्कि विश्व क्रिकेट का नेतृत्व करने की स्थिति में पहुंच चुका है।
अब टेस्ट नहीं, विश्व कप जीतने पर होना चाहिए फोकस
इस जीत ने वर्षों से चली आ रही उस धारणा को भी तोड़ दिया कि भारतीय महिला टीम केवल प्रतिभा के भरोसे प्रतिस्पर्धा करती है। अब उसके पास तकनीक है, आत्मविश्वास है, आक्रामकता है और सबसे महत्वपूर्ण, बड़े मैच जीतने का साहस है। लेकिन इसी ऐतिहासिक सफलता के बीच भारतीय क्रिकेट प्रशासन और चयनकर्ताओं के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा है क्या इस उपलब्धि को केवल उत्सव तक सीमित रखा जाएगा या इसे भविष्य की विश्व विजेता टीम तैयार करने के अवसर में बदला जाएगा? यदि भारतीय क्रिकेट वास्तव में इस जीत का मूल्य समझता है, तो अब पूरा ध्यान टेस्ट क्रिकेट की प्रशंसा से हटाकर वनडे और टी-20 प्रारूप पर केंद्रित करना होगा, क्योंकि आज विश्व क्रिकेट की असली प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा इन्हीं दोनों प्रारूपों में तय होती है।भारतीय महिला टीम पिछले कुछ वर्षों में कई बार विश्व कप और टी-20 विश्व कप के अंतिम चरण तक पहुंची है। 2017 का वनडे विश्व कप फाइनल, 2020 का टी-20 विश्व कप फाइनल और अनेक सेमीफाइनल इस बात के प्रमाण हैं कि प्रतिभा की कभी कमी नहीं रही। कमी रही तो केवल उस अंतिम कदम की, जो किसी अच्छी टीम को विश्व विजेता बनाता है। लॉर्ड्स की जीत यह संकेत देती है कि शायद अब वह मानसिक बाधा टूट चुकी है।
संतुलित टीम बनी भारत की सबसे बड़ी ताकत
भारतीय टीम की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलन है। स्मृति मंधाना जैसी तकनीकी बल्लेबाज, शेफाली वर्मा जैसी विस्फोटक सलामी बल्लेबाज, जेमिमा रोड्रिग्स की स्थिरता, ऋचा घोष की आक्रामकता और हरमनप्रीत कौर का अनुभव किसी भी आक्रमण को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। दीप्ति शर्मा और स्नेह राणा जैसी ऑलराउंडर खिलाड़ियों ने भारत को वह गहराई दी है, जिसकी कमी वर्षों तक महसूस होती रही।सबसे सुखद परिवर्तन तेज गेंदबाजी में दिखाई देता है। लंबे समय तक भारतीय महिला क्रिकेट स्पिन पर निर्भर रहा, लेकिन अब रेणुका सिंह, क्रांति गौड़ और नई पीढ़ी की तेज गेंदबाज यह विश्वास दिला रही हैं कि भारत किसी भी परिस्थिति में विपक्षी बल्लेबाजों पर दबाव बना सकता है।
मजबूत घरेलू ढांचा और नई पीढ़ी तैयार करना जरूरी
यहीं भारतीय क्रिकेट बोर्ड को सबसे दूरदर्शी निर्णय लेने होंगे। टेस्ट की सफलता से उत्साहित होकर यदि पूरा ध्यान फिर अगले द्विपक्षीय कार्यक्रमों तक सीमित रह गया, तो यह अवसर हाथ से निकल जाएगा। विश्व क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया का प्रभुत्व केवल उसकी प्रतिभा के कारण नहीं है। उसने लगातार अगली पीढ़ी तैयार की, घरेलू क्रिकेट को मजबूत बनाया, खिलाड़ियों को पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय मैच दिए और चयन प्रक्रिया में भविष्य को प्राथमिकता दी। भारत के सामने भी अब यही चुनौती है।महिला प्रीमियर लीग ने भारतीय महिला क्रिकेट को नई पहचान दी है। विदेशी खिलाड़ियों के साथ खेलने से भारतीय खिलाड़ियों का आत्मविश्वास, फिटनेस और मैच फिनिश करने की क्षमता बढ़ी है। लेकिन केवल चार सप्ताह की एक लीग किसी विश्व विजेता टीम की गारंटी नहीं बन सकती। इसके साथ मजबूत घरेलू वनडे प्रतियोगिता, नियमित रेड-बॉल क्रिकेट, तेज गेंदबाजों के लिए विशेष कार्यक्रम और राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी से निरंतर खिलाड़ियों का प्रवाह भी उतना ही आवश्यक है।
भारतीय क्रिकेट को अब केवल स्टार खिलाड़ियों पर नहीं, बल्कि मजबूत बेंच स्ट्रेंथ पर निवेश करना होगा। आज देश के विभिन्न राज्यों में अनेक युवा खिलाड़ी अपनी प्रतिभा से राष्ट्रीय चयनकर्ताओं का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। अंडर-19 विश्व कप और राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत के पास प्रतिभा का विशाल भंडार है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन खिलाड़ियों को समय रहते अंतरराष्ट्रीय वातावरण दिया जाए।पुरुष क्रिकेट की तरह महिला क्रिकेट में भी पीढ़ी परिवर्तन की योजना पहले से तैयार करनी होगी। हरमनप्रीत कौर और अन्य वरिष्ठ खिलाड़ियों का अनुभव अमूल्य है, लेकिन उनके साथ-साथ भविष्य के नेतृत्व को भी तैयार करना उतना ही आवश्यक है।
अगला लक्ष्य सिर्फ जीत नहीं, आईसीसी ट्रॉफियां
भारतीय महिला क्रिकेट के सामने अगला लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिएकेवल मैच जीतना नहीं, बल्कि आईसीसी ट्रॉफियां जीतना। आने वाले वनडे विश्व कप और टी-20 विश्व कप को ध्यान में रखते हुए टीम निर्माण, खिलाड़ी प्रबंधन और कार्यभार संतुलन पर अभी से काम शुरू करना होगा। तेज गेंदबाजों की फिटनेस, डेथ ओवर बल्लेबाजी, पावर हिटिंग और फील्डिंग के स्तर पर अभी भी सुधार की पर्याप्त गुंजाइश है। यदि इन क्षेत्रों पर गंभीरता से काम किया गया, तो भारत विश्व क्रिकेट की सबसे संतुलित महिला टीम बन सकता है।लॉर्ड्स की जीत इसलिए ऐतिहासिक नहीं है कि भारत ने इंग्लैंड को उसके घर में हराया। वह इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि इसने भारतीय महिला क्रिकेट को एक नई दिशा दिखाई है। अब यह समय आत्ममुग्ध होने का नहीं, बल्कि अगले अभियान की तैयारी का है। भारतीय क्रिकेट को यह समझना होगा कि इतिहास बनाने वाली टीमें केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं मनातीं, बल्कि हर उपलब्धि को अगले शिखर तक पहुंचने की सीढ़ी बना देती हैं।
यदि भारतीय क्रिकेट बोर्ड इस ऐतिहासिक क्षण का सही उपयोग करता है, तो आने वाले वर्षों में दुनिया भारतीय महिला क्रिकेट को केवल एक मजबूत टीम के रूप में नहीं, बल्कि विश्व क्रिकेट की नई महाशक्ति के रूप में देखेगी। लॉर्ड्स ने भारत को सम्मान दिलाया है; अब समय है कि वनडे और टी-20 विश्व कप भारत को वह गौरव दिलाएं, जिसका भारतीय महिला क्रिकेट दशकों से इंतजार कर रहा है।